व्यक्ति, समाज और राज्य के बीच संतुलित व्यवस्था
11 सितंबर प्रातःकालीन सत्र। हम प्रत्येक व्यक्ति पर तीन तरह का शासन मानते हैं। पहले है व्यक्ति का अपने ऊपर अपना शासन, दूसरा है परिवार और समाज का अनुशासन और तीसरा है राज्य का शासन। इस तरह प्रत्येक व्यक्ति स्वशासन, अनुशासन और शासन के बीच चलता रहता है। वर्तमान समय में स्वशासन उद्दंडता में बदलता जा रहा है, क्योंकि उस पर किसी का अनुशासन नहीं है। अनुशासन असफल होता जा रहा है, क्योंकि समाज और राज्य के बीच यदि संतुलन होता तो हम अनुशासन और शासन दोनों का प्रभाव देख सकते थे, लेकिन राज्य ने समाज को पूरी तरह अधिकार-विहीन कर दिया। इसका परिणाम हुआ कि व्यक्ति उद्दंड होता जा रहा है।
हम इस बीमारी को अच्छी तरह समझ रहे हैं, क्योंकि हमारा यह मानना है कि इस्लाम, हिंदुत्व और साम्यवाद, यह तीनों इस बीमारी के कारण नहीं हैं। इस बीमारी का कारण है पश्चिम का लोकतंत्र। लोकतंत्र और शेष तीनों व्यवस्थाओं के बीच जो संतुलन होना चाहिए था, वह नहीं है।
मैं आपको आसान शब्दों में समझाऊँ कि समाज, परिवार या अन्य सभी इकाइयों को बहिष्कार का अधिकार होना चाहिए। बहिष्कार ही अनुशासन बनाए रख सकता है। दुर्भाग्य से हमारे पश्चिम के लोकतंत्र में बहिष्कार का अधिकार छीन लिया है। हम नई समाज व्यवस्था में बहिष्कार का अधिकार सामाजिक संस्थाओं के पास सुरक्षित रखेंगे। परिवार और समाज को अनुशासन का पूरा अधिकार होना चाहिए और रहेगा। हम इस तरह की समाज और राज्य के बीच एक संतुलित व्यवस्था बनाने के पक्षधर हैं।
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