हम पिछले चार दिनों से समाज को तोड़ने वाले विषयों—महिला सशक्तिकरण, युवा सशक्तिकरण
हम पिछले चार दिनों से समाज को तोड़ने वाले विषयों—महिला सशक्तिकरण, युवा सशक्तिकरण, क्षेत्रीयता और धार्मिक संगठनों—पर चर्चा कर चुके हैं। आज हम इस बात पर विचार करेंगे कि समाज में जाति के आधार पर बन रहे संगठन भी समाज को तोड़ने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
ये जातिवादी संगठन निरंतर मज़बूत होते जा रहे हैं, क्योंकि राजनीतिक नेताओं की इनके साथ साठगांठ है। महिला–पुरुष या युवा–वृद्ध के नाम पर देश में अधिकतम तीन–चार प्रकार के ही विभाजन होते हैं। क्षेत्रीयता के नाम पर भी अधिक से अधिक दस विभाजन संभव हैं, लेकिन जातियों के नाम पर होने वाला विभाजन सैकड़ों प्रकार के टकराव पैदा करता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल जातिवाद को बढ़ावा देने में सबसे अधिक भूमिका निभाते हैं।
जाति मूल रूप से एक सामाजिक व्यवस्था है। जातीय संस्था बन सकती है, क्योंकि विवाह, खान-पान, व्यवसाय आदि में जाति सहायक हो सकती है। लेकिन जब जाति व्यवस्था वाद में बदल जाती है और संगठन का रूप ग्रहण कर लेती है, तब वही व्यवस्था समाज के लिए घातक बन जाती है।
वर्तमान समय में जाति व्यवस्था को जानबूझकर संगठन का रूप दिया जा रहा है। इसलिए इस विषय पर पूरे समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए। वैसे यदि जाति व्यवस्था भी कर्म के आधार पर निर्धारित हो जाए, तो यह समाज के लिए अधिक हितकारी सिद्ध हो सकती है।
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