आठ लुटेरों ने मिलकर किसी कमजोर महिला के सारे गहने और सामान लूट लिए।

मैं पिछले तीन दिनों से यूजीसी पर किसी भी प्रकार की चर्चा से बचता रहा, क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा था कि कहीं न कहीं कोई न कोई गंभीर त्रुटि हुई है। इस विषय में जब तक कोई ठोस सत्य सामने न आ जाए, तब तक कुछ भी बोलना या लिखना उचित नहीं होता। किंतु किसी भी विषय पर लिखने की तरह, इस बार भी मेरे कुछ मित्रों ने बार-बार मुझे यूजीसी पर लिखने के लिए दबाव डाला। अंततः मैंने यह निर्णय लिया कि इस विषय पर संक्षेप में ही कुछ लिखा जाए। मैं अपनी बात एक कहानी से शुरू करता हूँ। मान लीजिए कि आठ लुटेरों ने मिलकर किसी कमजोर महिला के सारे गहने और सामान लूट लिए। लूट के बाद जब वे सुरक्षित स्थान पर पहुँच गए, तो उनके बीच आपसी बँटवारे को लेकर विवाद शुरू हो गया। यह झगड़ा इतना बढ़ गया कि वे न्याय की माँग लेकर मेरे पास आ पहुँचे। मैं यह भली-भाँति जानता था कि वे आठों लूट कर आए हैं। मेरी इच्छा थी कि वे लूटा हुआ माल उसके वास्तविक मालिक को वापस कर दें, लेकिन वे लुटेरे आपसी बँटवारे में ‘न्याय’ के अतिरिक्त किसी अन्य विषय पर चर्चा करने को तैयार ही नहीं थे। आज मुझे जो टकराव दिखाई दे रहा है, वह सवर्ण और अवर्ण बुद्धिजीवियों के बीच लूट के माल के विभाजन का टकराव है। भीमराव अंबेडकर और नेहरू के नेतृत्व में गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी वर्ग की कृषि-उत्पादन व्यवस्था पर भारी कर लगाए गए और उसी धन से बुद्धिजीवियों की शिक्षा एवं सुविधाओं पर मनमाना खर्च किया गया। अब उन्हीं शिक्षा और सुविधाओं के बँटवारे को लेकर सवर्ण और अवर्ण बुद्धिजीवियों के बीच संघर्ष हो रहा है, और वे उस झगड़े में बजरंगमुनि से न्याय की माँग कर रहे हैं।
मैं पूछना चाहता हूँ—इस सवर्ण और अवर्ण बुद्धिजीवियों के संघर्ष में कहीं श्रमजीवियों के लिए भी न्याय की कोई बात उठ रही है क्या? क्या श्रम और बुद्धि के बीच लंबे समय से चले आ रहे इस अन्यायपूर्ण कार्यक्रम पर कोई गंभीर विचार किया जा रहा है? मैं यह भी मानता हूँ कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार से कोई त्रुटि हुई हो सकती है और यह भी संभव है कि सरकार भविष्य में उसे सुधार ले। लेकिन मैं प्रश्न उठाने वालों से यह जानना चाहता हूँ कि आप श्रम और बुद्धि के बीच इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विषय में क्या सोचते हैं? यूजीसी पर मैंने अपने विचार लिख दिए हैं। अब मैं अपने बुद्धिजीवी मित्रों के उत्तर की प्रतीक्षा करूँगा।