यूजीसी विवाद: संसाधनों के बँटवारे और केंद्रीकरण का प्रश्न
मैं पिछले पंद्रह दिनों से लगातार यूजीसी की चर्चा सुन रहा हूँ। बड़ी संख्या में लोगों ने मुझसे इस विषय पर विस्तार से अपनी बात रखने का आग्रह किया है। आज भी कुछ लोगों ने यूजीसी का मुद्दा उठाया, इसलिए मैं उचित समझता हूँ कि अपने मन की बात स्पष्ट रूप से सामने रख दूँ।
मेरे दृष्टिकोण से यूजीसी को लेकर जो विवाद दिखाई दे रहा है, वह मूलतः संसाधनों के बँटवारे और अधिकारों के केंद्रीकरण से जुड़ा प्रश्न है। देश की लगभग 98 प्रतिशत जनता पर विभिन्न प्रकार के कर लगाए जाते हैं और उस धन का एक बड़ा हिस्सा सीमित वर्ग—जैसे सरकारी कर्मचारी, नेता और न्यायपालिका से जुड़े पदाधिकारियों—के वेतन, भत्तों और सुविधाओं पर व्यय होता है। परिणामस्वरूप अधिकार, सम्मान और शक्ति धीरे-धीरे इन दो प्रतिशत लोगों के हाथों में सिमटते हुए प्रतीत होते हैं।
यदि आज यूजीसी को लेकर संघर्ष हो रहा है, तो वह भी इसी सीमित वर्ग के भीतर हिस्सेदारी के प्रश्न पर केंद्रित दिखाई देता है। आम जनता, मजदूर या गरीब व्यक्ति की बुनियादी समस्याएँ इन बहसों के केंद्र में कम ही दिखाई देती हैं। इसलिए मुझे लगता है कि इस विषय पर सतही विवाद के बजाय मूल संरचना पर विचार होना चाहिए।
मैंने इस पर गंभीरता से चिंतन किया है। मेरे मत में इसका एक महत्वपूर्ण समाधान यह हो सकता है कि सभी प्रकार के सरकारी वेतन और सुविधाएँ बाजार की वास्तविक दरों के अनुरूप कर दी जाएँ। न किसी नेता को बाजार से अधिक वेतन मिले, न किसी सरकारी कर्मचारी को, और न ही न्यायपालिका से जुड़े पदों को विशेष आर्थिक लाभ मिले। जब वेतन और सुविधाएँ संतुलित और पारदर्शी होंगी, तो अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं। यदि ऐसा प्रस्ताव रखा जाए, तो संभव है कि विभिन्न हित समूह एकजुट होकर उसका विरोध करें; किंतु तभी वास्तविकता भी स्पष्ट होगी।
कुछ समय पहले मैंने यूजीसी पर एक लेख लिखा। आश्चर्य यह हुआ कि जो लोग बार-बार मुझसे इस विषय पर लिखने का आग्रह कर रहे थे, वे ही खुलकर कर-व्यवस्था में सुधार, आम जनता पर कर-भार घटाने और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के वेतन-भत्तों में संतुलन लाने की बात सामने आकर कहने से पीछे हट गए। यदि हम सचमुच परिवर्तन चाहते हैं, तो स्पष्ट रूप से कहना होगा कि आम लोगों पर कर का बोझ कम किया जाए और सरकारी पदों से जुड़े वेतन व सुविधाओं की समीक्षा की जाए। केवल किसी मुद्दे की “आग” में अपनी-अपनी रोटियाँ सेंकना उचित नहीं है; आवश्यक है कि आग बुझाने का उपाय खोजा जाए।
मैं यह भी स्पष्ट कर चुका हूँ कि यदि यूजीसी की योजना सोच-समझकर और दीर्घकालिक नीति के तहत लागू की गई है, तो उसके तर्क और उद्देश्य स्पष्ट किए जाएँ। यदि इसमें त्रुटि है, तो न्यायालय इस पर निर्णय दे सकता है और सरकार को उस निर्णय को स्वीकार करना चाहिए।
दुर्भाग्य से कुछ लोगों ने इस मुद्दे को सवर्ण और अवर्ण के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है, जिससे समाज में अनावश्यक विभाजन उत्पन्न हो सकता है। मेरा मानना है कि ऐसे किसी भी प्रयास से बचना चाहिए, जो सामाजिक संघर्ष को बढ़ावा दे। यदि आरक्षण या आर्थिक असमानता जैसी समस्याओं का समाधान खोजना है, तो व्यापक आर्थिक सुधारों, कर संरचना में संतुलन और सार्वजनिक व्यय की पारदर्शिता पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
मेरे विचार से तात्कालिक और दीर्घकालिक—दोनों ही स्तरों पर समाधान का मूल बिंदु यही है कि विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के वेतन, भत्ते, सुविधाएँ और शक्ति संतुलित तथा जवाबदेह बनाई जाएँ। जब तक यह असंतुलन बना रहेगा, तब तक ऐसे विवाद समय-समय पर उभरते रहेंगे।
अंत में, मैं अपने साथियों से निवेदन करता हूँ कि हमें समाज को वर्गों में बाँटने वाली राजनीति से सावधान रहना चाहिए। किसी भी समस्या का लाभ उठाने के बजाय उसका न्यायसंगत और संतुलित समाधान खोजने का प्रयास ही राष्ट्रहित में होगा।
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