नई समाज व्यवस्था: साझा संपत्ति से समाप्त होंगे पारिवारिक संघर्ष

3 अप्रैल प्रातःकालीन सत्र — नई समाज व्यवस्था पर चर्चा

वर्तमान भारत में संपत्ति के मामले में जितने झगड़े न्यायालय में चल रहे हैं, उनमें से अधिकांश झगड़े विरासत के हैं। संपत्ति व्यक्तिगत है, ऐसी स्थिति में व्यक्ति के जीवित रहते भी विरासत के विवाद पैदा होते हैं और मरने के बाद तो होते ही हैं।

इसी तरह के विवाद पति-पत्नी के बीच भी तलाक के समय होते हैं। यदि आप कुल संपत्ति विवादों की गणना करें, तो आधे से अधिक संपत्ति विवाद विरासत के ही होते हैं। इस विवाद का समाधान होना चाहिए।

लेकिन जब तक संपत्ति का अधिकार व्यक्तिगत रहेगा, तब तक यह विरासत के झगड़े रहेंगे ही। जबकि दुनिया जानती है कि व्यक्ति जब जन्म लेता है, तो उसके पास शून्य संपत्ति होती है और मरते समय भी वह शून्य संपत्ति लेकर जाता है। फिर भी विरासत के झगड़े कायम रहते हैं।

यही कारण है कि हम लोगों ने यह नया सिद्धांत दुनिया को दिया है कि व्यक्तिगत संपत्ति का सिद्धांत समाप्त कर दीजिए, विरासत के सारे झगड़े खत्म हो जाएंगे। पति-पत्नी के बीच गुजारा भत्ता का कोई प्रावधान नहीं रहेगा। कोई भी किसी तरह का विभाजन या बंटवारा न्यायालय में जाएगा ही नहीं, क्योंकि जब व्यक्तिगत संपत्ति होगी ही नहीं, तो विवाद कैसा होगा।

संपत्ति परिवार की होगी और संयुक्त होगी। आप परिवार छोड़ते समय अपना हिस्सा ले सकते हैं—चाहे आप वृद्ध हों, बालक हों, जवान हों या महिला अथवा पुरुष—कोई भी क्यों न हो।

कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में वसीयत (विल) नहीं लिख सकेगा, न दान दे सकेगा, क्योंकि जब संपत्ति उसकी है ही नहीं, वह दान कैसे देगा। इसका अर्थ है कि सब कुछ परिवार की सहमति से ही संभव होगा।

मरने के बाद आपकी संपत्ति परिवार में विलीन हो जाएगी और जन्म लेते ही आप परिवार की पूरी संपत्ति में बराबर के भागीदार हो जाएंगे।

विरासत के झगड़ों को अब समाप्त करना ही चाहिए।