आरक्षण और UGC : संतुलित एवं न्यायपूर्ण समाधान की दिशा

यह सही है कि हम किसी भी प्रकार के आरक्षण का विरोध करते हैं। यह भी सही है कि हम यूजीसी में वर्तमान बदलावों के पक्षधर नहीं हैं। साथ ही यह भी उतना ही स्पष्ट है कि हम आरक्षण के नाम पर पुरानी, जड़ और अन्यायपूर्ण व्यवस्था को पुनः स्थापित नहीं होने देंगे।
स्वतंत्रता से पहले जो व्यवस्था प्रचलित थी, वह भी पूरी तरह अनुचित थी और हम उसे किसी भी रूप में पुनर्जीवित नहीं होने देंगे। वहीं स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया आरक्षण भी दीर्घकाल में अनेक जटिलताओं और विकृतियों को जन्म दे चुका है; इसलिए हमारा मानना है कि इस व्यवस्था का सम्यक् और संतुलित समाधान खोजा जाना चाहिए।
इसी उद्देश्य से मैंने कल आरक्षण की समाप्ति और उसके स्थान पर एक नई व्यवस्था के निर्माण के लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत किए थे। उन सुझावों पर किसी भी पक्ष ने खुलकर चर्चा करने की तत्परता नहीं दिखाई। ऐसा प्रतीत होता है कि समाज में एक ओर कुछ अंबेडकरवादी विचारधारा से जुड़े समूह हैं, जो आरक्षण को स्थायी व्यवस्था के रूप में बनाए रखना चाहते हैं; दूसरी ओर कुछ तथाकथित सवर्ण समूह हैं, जो आरक्षण समाप्ति के नाम पर पुनः ऊँच-नीच और विभाजनकारी भावनाओं को बढ़ावा देना चाहते हैं।
हम इन दोनों प्रवृत्तियों के विरुद्ध हैं। हम आरक्षण का न्यायसंगत, दीर्घकालिक और समावेशी समाधान चाहते हैं। इसके लिए हमने कुछ ठोस प्रस्ताव भी रखे हैं। हमारा मानना है कि किसी भी प्रकार की वैचारिक कट्टरता—चाहे वह सामाजिक हो, जातिगत हो या धार्मिक—समाज के लिए घातक है।
अतः हमारा प्रयास यह है कि आरक्षण के प्रश्न का समाधान टकराव या वैमनस्य के आधार पर नहीं, बल्कि संवैधानिक, नैतिक और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित नई व्यवस्था के माध्यम से किया जाए। सामान्य स्थिति में हमारा उद्देश्य सभी पक्षों के साथ संवाद स्थापित कर एक संतुलित और न्यायपूर्ण व्यवस्था विकसित करना है।
हम किसी भी प्रकार के धार्मिक या जातिगत कट्टरवाद के विरोधी हैं, और एक समरस, न्यायपूर्ण तथा संतुलित समाज की स्थापना के लिए हमारा प्रयास निरंतर जारी है।