प्रेम कुमार मणि का विमर्श : गांधी और सावरकर की वैचारिक दूरी

Prem Kumar Mani एक वामपंथी पृष्ठभूमि के विचारक माने जाते हैं, फिर भी वे अनेक अवसरों पर स्वतंत्र और मौलिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। मैं उन्हें पढ़ता रहा हूँ। कुछ दिन पहले उन्होंने लिखा कि Mahatma Gandhi और Vinayak Damodar Savarkar के बीच मूलभूत अंतर था—गांधी चाहते थे कि दुनिया की राजनीति का हिंदुकरण हो, जबकि सावरकर दुनिया के हिंदुओं का राजनीतिकरण चाहते थे। यह बात मैं भी लंबे समय से कहता रहा हूँ।

मेरे विचार से हिंदुत्व का राजनीतिकरण उचित नहीं है; बल्कि राजनीति को नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों की दिशा में अग्रसर होना चाहिए। इसी कारण मैं बचपन से गांधी-विचारों का समर्थक रहा हूँ और सावरकर की राजनीतिक अवधारणा से असहमत रहा हूँ। यही वजह है कि अनेक विषयों पर Rashtriya Swayamsevak Sangh से सहमति होने के बावजूद इस एक बिंदु पर मेरी सहमति नहीं बन सकी।

हालाँकि मेरा यह भी आकलन है कि पिछले आठ-दस वर्षों में संघ की दिशा में कुछ वैचारिक परिवर्तन दिखाई देते हैं, और वह सावरकर की अपेक्षा गांधी के कुछ विचारों की ओर अधिक झुकाव दिखा रहा है। वर्तमान समय में इसी आधार पर मैं संघ के साथ संवाद और तालमेल की स्थिति में स्वयं को पाता हूँ।

मेरे मत में हिंदुत्व का अत्यधिक राजनीतिकरण घातक हो सकता है, क्योंकि राजनीति का स्वभाव शक्ति-संतुलन और प्रतिस्पर्धा पर आधारित होता है, जबकि हिंदुत्व का आधार व्यापक सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना में निहित है। गांधी वर्णाश्रम व्यवस्था को एक नैतिक-सामाजिक ढाँचे के रूप में स्वीकार करते थे, जबकि सावरकर का दृष्टिकोण भिन्न था। इस विषय पर विचारधारात्मक मतभेद स्वाभाविक हैं।

मैं Prem Kumar Mani के इस लेखन का समर्थन करता हूँ और उन्हें धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने वैचारिक पृष्ठभूमि भिन्न होने के बावजूद अपने दृष्टिकोण को स्पष्टता से प्रस्तुत किया। विचार-विमर्श और असहमति के बीच संवाद की यही परंपरा किसी भी समाज के बौद्धिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।