तेल की राजनीति और भविष्य के युद्ध
मैंने अपने जीवन में जो भी भविष्यवाणियाँ की हैं, उनमें से लगभग सभी सच सिद्ध हुई हैं। मैंने लगभग सत्तर वर्ष पहले ही यह भविष्यवाणी की थी कि दुनिया में युद्ध मुख्यतः तेल के लिए होंगे। खनिज तेल ही एक ऐसी वस्तु है जिसके लिए लोग आपस में कटने-मरने को तैयार हो जाएँगे। आज भी यह बात काफी हद तक सच दिखाई देती है। आज यदि अमेरिका या अन्य देशों के बीच कहीं युद्ध हो रहा है, तो उसके मूल में अक्सर तेल की भूमिका दिखाई देती है। दुनिया इस बात को समझ भी रही है, लेकिन तेल का मोह उससे छूट नहीं रहा है।
भारत भी इससे अलग नहीं है। भारत के लोग भी यह जानते हैं कि तेल भारत की पूरी आबादी की प्राकृतिक आवश्यकताओं में केवल लगभग 10 प्रतिशत ही भूमिका निभाता है। शेष तेल का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा सुविधाओं में खर्च हो जाता है और लगभग 40 प्रतिशत विलासिता में चला जाता है।
स्पष्ट है कि तेल हमारी अनिवार्य आवश्यकता नहीं है, लेकिन हम इतने सुविधा-भोगी हो गए हैं कि विलासिता के मामले में भी तेल की खपत कम करने के लिए तैयार नहीं हैं। सच तो यह है कि यदि भारत केवल 10 प्रतिशत तेल की खपत कम कर दे, तो वह काफी हद तक आत्मनिर्भर हो सकता है। यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।
लेकिन भारत की संपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में विलासिता इस तरह घुल-मिल गई है कि हम 10 प्रतिशत तेल की खपत कम करने के लिए भी तैयार नहीं हैं। यदि भारत अपनी आंतरिक व्यवस्था में तेल का मूल्य बढ़ा दे, तो आराम से तेल की खपत कम की जा सकती है, लेकिन सुविधा और विलासिता में डूबे हुए लोग इसके लिए तैयार नहीं होते।
मैं फिर से निवेदन करना चाहता हूँ कि दुनिया में युद्धों को टालने के लिए तेल की खपत कम करने के उपाय खोजे जाने चाहिए। भारत दुनिया के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है कि उसने सभी प्रकार के टैक्स हटा दिए और साथ ही तेल की खपत भी कम कर दी।
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