नीतीश कुमार और भारत में कमजोर होता समाजवाद

कल मैंने नीतीश कुमार की चर्चा की थी। मेरा अब भी यह मानना है कि मनमोहन सिंह के बाद वर्तमान भारत में सबसे अधिक लोकतांत्रिक नेता नीतीश कुमार माने जा सकते हैं। नीतीश कुमार में तीन गुण बहुत मजबूती से दिखाई देते हैं—पहला, वे लोकतांत्रिक हैं; दूसरा, वे ईमानदार हैं; और तीसरा, वे धर्मनिरपेक्ष हैं।
नीतीश कुमार की नरेंद्र मोदी से इसलिए नहीं बन पाती, क्योंकि नरेंद्र मोदी उतने लोकतांत्रिक नहीं माने जाते जितने नीतीश कुमार हैं। दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी उस प्रकार का धर्मनिरपेक्ष नहीं है जैसा दृष्टिकोण नीतीश कुमार का है। हालांकि संघ और नरेंद्र मोदी स्वयं को ईमानदारी के मामले में अधिक दृढ़ मानते हैं।
दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव के बारे में यह आरोप लंबे समय से लगाया जाता रहा है कि वे पूरी तरह भ्रष्टाचार से जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि समय-समय पर नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ बदलते रहे।
लेकिन कुछ समय पहले लालू परिवार की ओर से जिस प्रकार के व्यक्तिगत आक्रमण नीतीश कुमार पर किए गए, वे उन्हें गहराई से आहत कर गए। चुनाव से पहले यह प्रचार भी किया गया कि अब नीतीश कुमार अयोग्य हो गए हैं। यह बात भी बार-बार कही गई कि नीतीश कुमार दल बदलकर फिर लालू के साथ जुड़ना चाहते हैं।
एक डॉक्टर के बुर्का हटाने की घटना को भी जिस तरह से अत्यधिक तूल दिया गया, वह उचित नहीं था। इसके अलावा जिस प्रकार विपक्ष के नेता के पद को लेकर षड्यंत्र की बातें सामने आईं और ममता बनर्जी, राहुल गांधी तथा लालू प्रसाद यादव पर मिलकर नीतीश कुमार को किनारे करने के आरोप लगे, उस परिस्थिति में भी नीतीश के सामने बहुत अधिक विकल्प नहीं बचे थे।
मेरा मानना है कि वर्तमान भारत में समाजवाद का ईमानदार सिपाही यदि कोई है, तो वह नीतीश कुमार ही हैं। कुछ हद तक अखिलेश यादव को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन नीतीश कुमार की तुलना में नहीं। लालू प्रसाद यादव को मैं एक ढोंगी समाजवादी मानता हूँ; समाजवाद का लालू परिवार से वास्तविक अर्थों में कोई लेना-देना नहीं है।
फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत में समाजवाद की राजनीतिक शक्ति लगातार कमजोर होती जा रही है। मैं स्वयं प्रारंभ से समाजवादी विचारों से प्रभावित रहा हूँ, इसलिए हमेशा नीतीश कुमार को पसंद करता रहा हूँ। लेकिन अब न तो समाजवाद का भविष्य स्पष्ट दिखाई देता है और न ही नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य उतना मजबूत दिखता है।
वर्तमान परिस्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि भारत की राजनीति में अब एक ही प्रमुख दिशा उभरती दिखाई दे रही है, और वह है गांधीवादी हिंदुत्व।