होली: धार्मिक नहीं, एक सामाजिक उत्सव

2 दिन पहले ही होली का त्योहार संपन्न हुआ है। भारत में इस समय एक बहस छिड़ गई है कि क्या होली शूद्रों का त्योहार है। इस विषय में मेरे भी अपने विचार हैं। मेरे विचार से होली कोई धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि एक सामाजिक त्योहार है। इसका अर्थ यह है कि होली किसी एक विशेष धार्मिक घटना से प्रारंभ नहीं हुई थी, बल्कि यह समाज की परंपराओं से विकसित हुआ उत्सव है।
प्राचीन समाज ने वर्ण व्यवस्था के आधार पर चार प्रमुख सामाजिक त्योहारों की व्यवस्था बनाई थी—रक्षाबंधन, दशहरा, दीपावली और होली। वर्ष में ये त्योहार इसी क्रम से मनाए जाते थे। इन त्योहारों में एक विशेष वर्ण के लोग नेतृत्व और व्यवस्था का दायित्व निभाते थे, जबकि अन्य तीनों वर्णों के लोग भी उसमें सहभागी होते थे। इसका अर्थ है कि इन चारों त्योहारों की अपनी-अपनी अलग संस्कृति थी। समय के साथ इनमें अलग-अलग प्रकार की बुराइयाँ भी आईं और कुछ विशेष उपलब्धियाँ भी रहीं।
होली का त्योहार शूद्रों के नेतृत्व में मनाया जाता था, जिसमें अन्य तीनों वर्णों के लोग भी भाग लेते थे। इसी प्रकार अन्य त्योहारों में भी अलग-अलग वर्णों की भूमिका होती थी, किंतु उस त्योहार की व्यवस्था और नेतृत्व मुख्यतः एक ही वर्ण के हाथ में रहता था।
इस कारण होली के साथ प्रह्लाद की कथा भी जुड़ गई। यह संभव है कि किसी समय यह घटना इस पर्व के साथ जोड़ दी गई हो, किंतु होली का मूल संबंध प्रह्लाद की घटना से नहीं है। होली मूलतः एक सामाजिक उत्सव है और सामाजिक परंपराओं के अनुसार ही मनाया जाता रहा है।
इसलिए होली को केवल शूद्रों का त्योहार कहना उचित नहीं है। यह कहना अधिक उचित होगा कि परंपरागत रूप से इसका नेतृत्व शूद्रों के हाथ में रहता था, जबकि इसमें समाज के सभी वर्गों की भागीदारी होती थी। मेरे विचार से इन चारों त्योहारों को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव के रूप में समझना अधिक उचित होगा।