राज्य की आर्थिक नीति और असमानता का चक्र
10 मार्च, प्रातःकालीन सत्र।
राज्य व्यवस्था समाज को अपने नियंत्रण में बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक तरीकों से कई प्रकार के प्रयोग करती है। इन उपायों में एक महत्वपूर्ण आर्थिक तरीका भी होता है। कई बार यह देखा जाता है कि राज्य की नीतियाँ ऐसी बनती हैं जिनसे आर्थिक असमानता कम होने के बजाय बढ़ती हुई दिखाई देती है।
इसके लिए राज्य अक्सर ऐसी व्यवस्था बनाता है कि संपन्न लोगों पर प्रत्यक्ष कर लगाए जाते हैं, लेकिन उन्हें विभिन्न प्रकार की अप्रत्यक्ष सुविधाएँ भी मिलती रहती हैं। दूसरी ओर गरीब लोगों पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ अधिक होता है, जबकि उन्हें प्रत्यक्ष रूप से कुछ सहायता या सुविधाएँ दी जाती हैं। इस प्रकार एक जटिल आर्थिक ढाँचा बनता है जिसमें असमानता बनी रहती है।
ऐसी स्थिति में दो परिणाम सामने आते हैं। एक ओर आर्थिक असमानता समाप्त नहीं होती, बल्कि कई बार बढ़ती हुई प्रतीत होती है। दूसरी ओर गरीब वर्ग को मिलने वाली प्रत्यक्ष सहायता के कारण वे राज्य के प्रति आभार व्यक्त करते रहते हैं। इस तरह राज्य को दो प्रकार का लाभ मिलता है—असमानता का ढाँचा भी बना रहता है और लोगों की निर्भरता भी राज्य पर बढ़ती जाती है।
कुछ आलोचकों का मानना है कि भारत में भी ऐसी प्रवृत्तियाँ देखी जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, कई प्रकार के अप्रत्यक्ष कर ऐसे होते हैं जो सामान्य उपभोक्ता या किसान पर भी प्रभाव डालते हैं, जबकि दूसरी ओर सरकारें गरीबों के लिए भोजन, नकद सहायता या अन्य योजनाएँ भी चलाती हैं। इसी प्रकार संपन्न वर्ग पर प्रत्यक्ष कर लगाए जाते हैं, लेकिन उन्हें व्यापार या उद्योग के क्षेत्र में कुछ नीतिगत सुविधाएँ भी मिल सकती हैं।
परिणामस्वरूप कई बार यह धारणा बनती है कि वास्तविक लाभ और बोझ का वितरण जटिल है—किसी को प्रत्यक्ष लाभ मिलता है तो किसी को अप्रत्यक्ष सुविधा। इसलिए इस विषय पर समाज में खुली चर्चा और समझ विकसित करना आवश्यक है, ताकि लोग आर्थिक नीतियों को बेहतर ढंग से समझ सकें और उनके प्रभाव का संतुलित आकलन कर सकें।
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