ईरान–संयुक्त राज्य अमेरिका संघर्ष: शक्ति, कूटनीति और जोखिम का सवाल
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष लगातार जारी है। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह अभी निश्चित नहीं है; लेकिन एक बात कही जा सकती है कि ईरान ने इस टकराव में उतरकर एक बड़ी भूल की है।
दुनिया में मोटे तौर पर दो प्रकार की शक्तियाँ दिखाई देती हैं—एक लोकतांत्रिक शक्तियाँ और दूसरी तानाशाही प्रवृत्ति की शक्तियाँ। लोकतांत्रिक शक्तियों के रूप में अक्सर अमेरिका के नेतृत्व की चर्चा की जाती है, जबकि तानाशाही प्रवृत्ति की शक्तियों के रूप में चीन के नेतृत्व को देखा जाता है। इन दोनों के बीच कुछ देश ऐसे भी होते हैं जो दोनों पक्षों से संतुलित संबंध बनाए रखते हुए स्वतंत्र बने रहने की कोशिश करते हैं। कई मुस्लिम देश, भारत और अन्य कुछ राष्ट्र भी इसी प्रकार संतुलन की नीति अपनाने का प्रयास करते रहे हैं।
लेकिन ईरान ने कठोर रुख अपनाकर एक अलग शक्ति के रूप में उभरने की कोशिश की, जबकि उसके पास उतनी सामर्थ्य नहीं थी। यह भी प्रश्न उठता है कि ईरान को अपने नागरिकों पर हिजाब को लेकर इतनी कठोरता दिखाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। क्या दुनिया ऐसी कठोरता को अनदेखा कर सकती है? इसी प्रकार हिज़्बुल्लाह, हमास और हूती जैसे संगठनों को समर्थन देकर अन्य देशों में अस्थिरता पैदा करने की नीति भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का विषय बनी है। दुनिया इन घटनाओं को देखती है और उनका आकलन भी करती है।
संभव है कि ईरान को यह विश्वास रहा हो कि अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश है और इसलिए वह उसके साथ अन्याय या कठोर व्यवहार नहीं करेगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह भी संभव है कि किसी देश में कठोर नेतृत्व उभर आए। यदि ऐसा होता है, तो फिर यह सुनिश्चित नहीं कहा जा सकता कि उससे टकराव में कोई देश सुरक्षित रह पाएगा।
इतिहास में वियतनाम, अफगानिस्तान और क्यूबा जैसे देशों के उदाहरण भी दिए जाते हैं, जिनके साथ अमेरिका के लंबे संघर्ष हुए और जिनके प्रभाव आज भी विभिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं। ऐसे उदाहरणों से यह संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय टकराव बहुत जटिल होते हैं और उनके परिणाम दूरगामी होते हैं।
यह कहना आवश्यक नहीं कि अमेरिका का हर कदम लोकतांत्रिक या न्यायपूर्ण ही है, और यह भी आवश्यक नहीं कि हर निर्णय सही हो। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वर्तमान परिस्थितियों में ईरान का यह टकराव जोखिम भरा कदम प्रतीत होता है। जिस व्यवस्था में शक्तिशाली देश ही अक्सर न्याय और अन्याय का निर्णय करते हैं, वहाँ अपनी शक्ति और सीमाओं को समझे बिना अत्यधिक टकराव का रास्ता चुनना कई बार नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है।
इस संदर्भ में कुछ लोग यह भी मानते हैं कि संतुलित और व्यावहारिक कूटनीति—जैसी कि भारत के नेतृत्व में देखने को मिलती है—कई बार टकराव की बजाय संवाद और संतुलन का रास्ता दिखाती है।
Comments