राष्ट्र, राज्य और समाज: सर्वोच्चता का वास्तविक केंद्र कौन?
समाज में राष्ट्र भावना अत्यंत प्रबल होती है। राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति समाज में स्वाभाविक सम्मान रहता है, जबकि ‘राज्य’ का अर्थ प्रायः सरकार से लिया जाता है और सरकार के प्रति नागरिकों में एक प्रकार का भय भी देखा जाता है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि राष्ट्र व्यवस्था संरक्षक की भूमिका निभाती है, जबकि राज्य व्यवस्था रक्षक की भूमिका में होती है। दोनों की प्रकृति और स्थिति अलग-अलग हैं।
किन्तु वर्तमान विश्व परिदृश्य में राज्य स्वयं को ही राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने लगा है। राज्य यह धारणा स्थापित करने का प्रयास कर रहा है कि राष्ट्र धर्म से भी ऊपर है, समाज से भी ऊपर है, और वह सर्वशक्तिमान एवं संप्रभु इकाई है।
ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि राष्ट्र और राज्य की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से अलग-अलग परिभाषित किया जाए। मेरे विचार से राष्ट्र को समाज का प्रतिनिधि होना चाहिए, जबकि राज्य को समाज का प्रबंधक (मैनेजर) होना चाहिए। राष्ट्र की अपनी स्वतंत्र व्यवस्था हो, और राज्य व्यवस्था उससे पृथक रहकर कार्य करे।
इन दोनों की भूमिकाएँ क्या हों—इस विषय पर गंभीर चिंतन और मंथन की आवश्यकता है। राष्ट्र और राज्य का एकाकार हो जाना समाज व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
अतः चाहे राज्य हो, राष्ट्र हो या धर्म—कोई भी समाज से ऊपर नहीं होना चाहिए। समाज ही सर्वोच्च होना चाहिए।
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