राजनीतिक विमर्श में भावनात्मक बयान और उनकी व्याख्या
21 Mar 26 00:03
6
राजनीतिक विमर्श में भावनात्मक बयान और उनकी व्याख्या
मेरे एक अच्छे मित्र कृष्ण अवतार त्रिपाठी ‘राही’ जी ने मुझसे यह प्रश्न किया है कि भारत के प्रधानमंत्री ने भारत को अपनी माता और इसराइल को पिता स्वीकार किया है। मुझे यह नहीं पता कि यह कब की और किस प्रकार की घटना है, लेकिन मैं यह मानता हूँ कि त्रिपाठी जी झूठ नहीं बोलते हैं।
यह प्रश्न सिर्फ त्रिपाठी जी ने ही नहीं किया है, बल्कि कई कांग्रेसी नेताओं ने भी यह सवाल उठाया है। मैंने भी इस पर विचार किया। भारत हमारी माता है—यह तो हम सब मानते हैं। पिता कौन है, इसकी खोज की जा रही है।
जब कांग्रेस पार्टी तथा राही जी ने ईरान को अपना “पिता” मान लिया है, तो हमारे सामने इसराइल को पिता घोषित करने के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं बचता। हम मुल्लाओं को पिता घोषित नहीं कर सकते—आप कर सकते हैं। आपने पहल की है, हमें इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
क्योंकि यदि कोई हमारी माता है, तो पिता भी अवश्य होगा, क्योंकि हम बिना पिता के पैदा नहीं हुए हैं। इसलिए पिता को स्वीकार करने में हमें कोई शर्म नहीं है।
Comments