दुर्घटना में संवेदना बनाम अवसरवाद: समाज का कड़वा सच

एक कहानी है कि एक गाय गड्ढे में गिर गई और उसका पैर टूट गया। कुछ लोग दया करके गाय की मदद करने के लिए आ जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी चील, कौवे, गिद्ध और कुत्ते आ जाते हैं, जो उस गिरी हुई गाय का मांस नोच-नोचकर खाने की योजना बनाते हैं। यह प्रकृति में होता ही है।

वर्तमान समय में रायपुर शहर में एक अस्पताल के सीवर को साफ करने के दौरान तीन मजदूरों की मौत हो गई। कुछ लोगों ने मिलकर उन तीनों मजदूरों के परिवारों को 30-30 लाख रुपये का मुआवजा भी दिलवा दिया। इसके बाद भी पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन को नोटिस दे दिया, मानवाधिकार आयोग कूद पड़ा, दलित आयोग भी बीच में आ गया। पत्रकार लोग तो पूरे-पूरे पेज छाप रहे हैं। चील-कौओं ने अपना धंधा बना लिया है। सब काम छोड़कर सिर्फ एक ही काम कर रहे हैं—मृतकों के बच्चों का क्या होगा, मृतकों की मां-बहनें बिलख रही हैं।

यदि इन बिचौलियों को पैसा दे दिया जाए, तो सारा नाटक बंद हो जाएगा। ये बिचौलिए दिन-रात हल्ला कर रहे हैं—क्या पैसे से आदमी जी सकता है? सच्चाई यह है कि दुर्घटनाओं में अवसर खोजने के लिए देशभर में एक गिरोह तैयार हो गया है, जो मीडिया, टीवी, विभिन्न आयोगों, पुलिस या किसी न किसी नाम पर अपनी दुकानदारी करने के लिए तैयार बैठा है।

मृतकों की सहायता में होने वाले खर्च की तुलना में इन “पशुओं” का मुंह बंद करने में अधिक खर्च हो रहा है। इन बिचौलियों से भी समाज को मुक्त करने की आवश्यकता है। जिस तरह मक्खियाँ शरीर में घाव खोजती रहती हैं, उसी तरह ये बिचौलिए दिन-रात दुर्घटनाओं की तलाश में रहते हैं।