यूजीसी विवाद और राजनीतिक असमंजस: पक्ष-विपक्ष दोनों की परीक्षा

कल पटना में यूजीसी के वर्तमान कानून के समर्थन में एक बड़ी रैली निकाली गई। इस रैली में दलित नेताओं, कांग्रेसीयों और अन्य विपक्षी नेताओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया, गिरफ्तारियां भी दीं। अब यूजीसी का मुद्दा पक्ष-विपक्ष के रूप में सामने आ गया है।

मैं व्यक्तिगत रूप से हमेशा ही आरक्षण का विरोधी रहा हूँ, क्योंकि मेरा यह मानना है कि आरक्षण के नाम पर गाय की रोटी कुत्ता खा रहा है, कुत्ता मोटा हो रहा है और काटने को भी दौड़ रहा है। लेकिन आरक्षण का समाधान मिल-बैठकर खोजना चाहिए, खींचतान से नहीं।

लेकिन संघ के कुछ लोगों ने पहल करते हुए यूजीसी का विरोध किया। जल्दी ही यह विरोध उनके हाथ से निकल गया और विपक्ष ने इस मुद्दे को लपक लिया। परिणाम यह हुआ कि संघ के लोगों को पीछे मुड़ना पड़ा। लेकिन विपक्ष ने भी जिस तरह इस मुद्दे को आगे बढ़ाया था, उसे भी यह महसूस होने लगा कि इस आधार पर उसके दलित वोट चिटक सकते हैं, इसलिए विपक्ष ने भी इससे दूरी बनानी शुरू कर दी है।

इस पूरे मुद्दे पर सबसे हास्यास्पद स्थिति उन प्रवीण तोगड़िया, उद्धव ठाकरे के तथाकथित ब्राह्मणों के सामने दिख रही है। उनके सामने संकट पैदा हो गया है, जिन्होंने संघ के सामने खड़े होकर यूजीसी का विरोध किया था और अब उन्हें ही विपक्षी नेताओं के सामने खड़े होकर उनका विरोध करना पड़ेगा। उन ब्राह्मणों के सामने ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि “धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का।”

मेरे विचार से अब भी मिल-बैठकर सोचने का अवसर है। इस सारे घटनाक्रम से एक लाभ अवश्य हुआ है कि आरक्षण एक नई चर्चा में शामिल हो गया है, लेकिन इस चर्चा का लाभ मुसलमान को नहीं उठाने देना चाहिए, जो इसका लाभ उठाने के लिए बहुत आतुर दिख रहे हैं।

आरक्षण का समाधान मिल-बैठकर खोजना चाहिए और मेरा अपना विचार है कि नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत और योगी आदित्यनाथ पर पूरा भरोसा रखकर यह उम्मीद करनी चाहिए कि समस्या का ठीक समय पर ठीक समाधान होगा।