जन विश्वास विधेयक: न्याय व्यवस्था में बदलाव की दिशा

मैंने अपने जीवन में बहुत-सी बातें लिखीं और 25 वर्ष पहले उनका एक संकलन भी समाज को समर्पित किया। मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि वर्तमान भारत सरकार लगभग उन्हीं विचारों को अंतिम स्वरूप दे रही है, क्योंकि मैंने जो उस समय निष्कर्ष निकाले थे, वर्तमान सरकार भी अब उसी दिशा में पहुँच रही है।

मैंने अपनी पुस्तक में लिखा था कि सभी प्रकार के मुकदमे पहले सरकारी न्यायालय में चलने चाहिए, और यदि किसी को सरकार के न्यायालय के निर्णय के खिलाफ आपत्ति हो, तो वह स्वतंत्र न्यायपालिका के न्यायालय में अपील कर सकता है। इस प्रकार अधिकांश मुकदमे सरकारी न्यायालय में ही निपट जाएंगे और बहुत कम मामले ही स्वतंत्र न्यायालय तक पहुँचेंगे। सरकारी न्यायालय तत्काल न्याय करेंगे और मुकदमे लंबित (पेंडिंग) नहीं रहेंगे।

लेकिन मेरी बात उस समय अनसुनी कर दी गई। अब भारत सरकार धीरे-धीरे उसी दिशा में कदम बढ़ा रही है। अभी सरकार ने कई मुकदमों को आपराधिक श्रेणी से बाहर कर दिया है। ऐसे सैकड़ों कानून समाप्त किए जा रहे हैं, जो पहले आपराधिक थे और जिनमें जेल की सजा का प्रावधान था। अब इन मामलों में सरकारी विभाग ही निर्णय कर सकेंगे, और यदि किसी को उस निर्णय से आपत्ति होगी, तभी वह मामला न्यायालय में जाएगा।

मैं सरकार के इस निर्णय को “देर आयद, दुरुस्त आयद” के रूप में देखता हूँ। फिर भी, यह “जन विश्वास विधेयक” एक छोटा-सा कदम है—अभी बड़ी संख्या में ऐसे मामलों को और बाहर निकालने की आवश्यकता है।

मैं “जन विश्वास विधेयक” लाने के लिए भारत सरकार को धन्यवाद देता हूँ।