नई शिक्षा व्यवस्था: ज्ञान, योग्यता और अनुभव का संतुलन
कल रात 7:30 से 9:30 बजे तक चर्चा कार्यक्रम के अंतर्गत शिक्षा व्यवस्था पर विचार-विमर्श हुआ। यह बात सामने आई कि प्राचीन शिक्षा व्यवस्था वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से कई मायनों में बेहतर थी, क्योंकि उसमें ज्ञान और शिक्षा दोनों का संतुलित समावेश था।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली मुख्यतः नौकरी पैदा कर रही है, न कि वास्तविक रोजगार या अनुभव। आज योग्यता के विस्तार से अधिक महत्व नौकरी को दिया जा रहा है।
फिर भी यह निष्कर्ष सामने आया कि पुरानी शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह से पुनः लागू करना अब संभव नहीं है। हाँ, वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आवश्यक संशोधन अवश्य किए जा सकते हैं।
मेरे विचार से एक महत्वपूर्ण संशोधन यह हो सकता है कि अभी की व्यवस्था में लगभग 20 वर्ष तक केवल शिक्षा दी जाती है और उसके बाद अनुभव मिलता है। इसके स्थान पर प्रस्तावित प्रणाली में प्रत्येक बालक का प्रारंभ में ही एक प्री-टेस्ट लिया जाए, और उसकी उस समय की योग्यता के आधार पर उसे आगे की शिक्षा दी जाए। इससे ज्ञान और शिक्षा के बीच की दूरी कम हो सकती है।
ऐसी स्थिति में बालक का परिवार भी उसकी दिशा तय करने में सहायक हो सकता है। मैं जानता हूँ कि अधिकांश बालक अपने पारिवारिक व्यवसाय से संबंधित क्षेत्रों में ही आगे बढ़ेंगे, लेकिन इसके बावजूद एक निष्पक्ष परीक्षा आवश्यक होनी चाहिए, ताकि यह तय किया जा सके कि बालक को किस क्षेत्र में आगे बढ़ाया जाए।
दूसरा मेरा सुझाव यह है कि शिक्षा को पूरी तरह सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाए। सरकार केवल परीक्षा लेकर विद्यार्थियों की योग्यता की घोषणा करे, न कि शिक्षा की प्रक्रिया को नियंत्रित करे।
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