न्यायिक निर्णयों में अंतर: तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ मामलों पर सवाल
कल हमारे भारत की न्यायपालिका ने दो महत्वपूर्ण निर्णय दिए। एक तमिलनाडु से संबंधित है और दूसरा छत्तीसगढ़ से।
तमिलनाडु से संबंधित मामले में चार-पाँच वर्ष पहले कोरोना काल में कुछ पुलिसकर्मियों ने गैरकानूनी कार्य करते हुए दो लोगों को जेल में बंद करके पीटा, जिससे दोनों की मृत्यु हो गई। न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेकर कार्यवाही की और चार-पाँच वर्षों में ही उन पुलिसकर्मियों के लिए फाँसी की सज़ा घोषित कर दी।
दूसरे मामले में, छत्तीसगढ़ में कुछ पुलिसकर्मियों ने योजना बनाकर षड्यंत्रपूर्वक एक बड़े नेता की हत्या कराई। षड्यंत्र पूरी तरह प्रमाणित हो गया, और षड्यंत्र में मुख्यमंत्री का बेटा भी प्रमुख रूप से शामिल पाया गया। न्यायालय ने 23 वर्ष के बाद उसे आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।
गंभीर प्रश्न यह उठता है कि छत्तीसगढ़ के मामले में योजना बनाकर, जानबूझकर, स्वार्थ के तहत हत्या की गई, जबकि तमिलनाडु के मामले में पुलिसकर्मियों ने कथित रूप से जनहित समझकर मारपीट की, जिससे मृत्यु हो गई। छत्तीसगढ़ के मामले में हत्या हुई, जबकि तमिलनाडु के मामले में मृत्यु हुई—फिर भी न्यायपालिका ने तमिलनाडु के मामले में फाँसी और छत्तीसगढ़ के मामले में आजीवन कारावास की सज़ा दी।
जबकि तर्क यह दिया जा रहा है कि तमिलनाडु के मामले में हत्या किसी षड्यंत्र के अंतर्गत नहीं हुई थी और छत्तीसगढ़ के मामले में षड्यंत्र के अंतर्गत हुई थी। संविधान एक है, कानून एक है, फिर निर्णय में इतना अंतर क्यों?
छत्तीसगढ़ के मामले में धारा 302 के अंतर्गत इसे विशेष (विलक्षण) मामला माना जाना चाहिए था, और तमिलनाडु के मामले को धारा 304 के अंतर्गत त्रुटि (गलती) माना जाना चाहिए था। इसलिए इस विषय पर चर्चा आवश्यक प्रतीत होती है।
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