विचारों की प्रारंभिक यात्रा: आर्य समाज और समाजवाद से जुड़ाव

बचपन से ही मेरा संघ के साथ कोई संबंध नहीं रहा। मैं आर्य समाज से जुड़ा रहा। मैं समाजवादी रहा हूँ, लोहिया जी के विचारों से प्रभावित रहा। फिर भी संघ के अनेक कार्य मुझे प्रभावित करते थे, इसलिए मैं जनसंघ से जुड़ गया था।

लेकिन इन सब के बाद भी मेरे और संघ के बीच एक स्पष्ट दूरी थी। इसका कारण था कि संघ चरित्र पर बहुत अधिक महत्व देता था। मेरा यह मानना था कि चरित्र निर्माण की तुलना में व्यवस्था परिवर्तन अधिक आवश्यक है। मेरे विचारों के अनुसार राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था में आई बुराइयाँ चरित्र गिरने का प्रमुख कारण हैं, परिणाम नहीं।

संघ इस बात से सहमत नहीं था। संघ यह सोचता था कि लोगों का चरित्र ठीक हो जाएगा तो व्यवस्था अपने आप ठीक हो जाएगी। दूसरी बात यह थी कि संघ पहचान-प्रधान हिंदुत्व का पक्षधर था, जबकि मैं गुण-प्रधान हिंदुत्व का। संघ सावरकरवादियों को बहुत महत्व देता था और गांधी का खुलकर विरोध करता था। मैं खुलकर गांधी विचारों का समर्थक था और सावरकर के विचारों के विरुद्ध था।

तीसरी बात यह थी कि संघ आवश्यकता पड़ने पर सामाजिक बल प्रयोग की अनुमति देता था, जबकि मैं बल प्रयोग की जिम्मेदारी सरकार की समझता था। समाज को बल प्रयोग से दूर रहना चाहिए।

इस तरह अनेक मामलों में एक साथ होते हुए भी कुछ मामलों में मेरे और संघ के बीच हमेशा अंतर बना रहा।

नरेंद्र मोदी के आने के बाद उनकी कार्यशैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया और 2017 के बाद संघ के विचारों में जो बदलाव आया, उसके बाद मैं पूरी तरह संघ के साथ हो गया। इस तरह वर्तमान समय में मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ कि संघ और नरेंद्र मोदी बिल्कुल सही दिशा में चल रहे हैं।

मैं जैसा बचपन से अब तक सोच रहा था, सरकार उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। मुझे खुशी है कि मेरे जीवन के इस अंतिम सत्र में देश अच्छे हाथों में सुरक्षित है और इन प्रयत्नों में मैं अपनी भूमिका से संतुष्ट हूँ।