आईपीएल टिकट से कृषि बाजार तक : मूल्य नियंत्रण और ब्लैक की समस्या

अभी रायपुर में आईपीएल क्रिकेट के मैच संपन्न हुए। आईपीएल के टिकट ब्लैक में बिके। मैच में जो खाना दिया गया, वह भी बहुत महँगा था। सरकार इस पर चिंता कर रही है। कभी-कभी रेलवे के टिकट भी ब्लैक में बिकते हैं। कॉलेजों में जो बच्चे डॉक्टरी में प्रवेश लेते हैं, वहाँ भी लाखों रुपये की घूस दी जाती है।

मैं अभी तक नहीं समझ सका कि ब्लैक होता क्यों है। यदि सरकार सस्ता देना बंद कर दे, तो ब्लैक अपने आप खत्म हो जाएगा। सब चीजें आप बाजार दर पर दे दीजिए। आईपीएल मैचों का टिकट कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है, वह सुविधा की वस्तु है। रेल में यात्रा करना भी अनिवार्य आवश्यकता नहीं, बल्कि सुविधा के लिए है। सब सुविधा के सामानों को बाजार दर पर कर दीजिए, ब्लैक अपने आप खत्म हो जाएगा। लेकिन सरकार ब्लैक को जिंदा रखना चाहती है।

आप खाद सस्ती क्यों दे रहे हैं? खाद को महँगा कर दीजिए, ब्लैक खत्म हो जाएगा। मेरा विचार है कि सरकार को इस प्रकार के किसी भी मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सब कुछ बाजार पर छोड़ दीजिए, ब्लैक होगा ही नहीं।

आप गंभीरता से विचार करिए कि बाजार में धान ₹20 है और सरकार ₹30 में खरीदेगी, जबकि गन्ना बाजार में ₹30 है और सरकार ₹20 में खरीदेगी — इसका क्या मतलब है? इसे मूर्खता कहा जाए या धूर्तता?

धान को बाजार दर पर छोड़ दीजिए, गन्ने को बाजार दर पर छोड़ दीजिए। ब्लैक और तस्करी भारत से पूरी तरह समाप्त हो जाएँगे।