देश के युवा आंदोलन की वर्तमान दिशा पर गंभीर प्रश्न

 

वर्तमान समय में हमारे देश का युवा आंदोलन किस दिशा में जा रहा है, यह एक गंभीर चिंतन का विषय है। मेरे विचार से देश का एक वर्ग युवाओं को एकजुट करके समाज में युवा और वृद्ध के बीच विभाजन उत्पन्न करना चाहता है। वह यह स्थापित करने का प्रयास करता है कि वृद्ध लोगों की सुविधा और अस्तित्व केवल युवाओं के माध्यम से ही सुरक्षित हैं।

कुछ युवाओं में यह प्रवृत्ति दिखाई देती है कि वे संगठित शक्ति के आधार पर व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण चाहते हैं। वे प्रायः सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं और कठिन श्रम वाले कार्यों से दूरी बनाना चाहते हैं। पकोड़ा बेचने वाले, रिक्शा चलाने वाले या खेत में काम करने वाले लोगों को कई बार समाज में कम सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, जबकि वास्तव में यही कार्य समाज और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।

आज का युवा स्वयं को “देश का भविष्य” कहता है, लेकिन भविष्य तभी मजबूत होगा जब वह श्रम, अनुभव और ज्ञान — तीनों का सम्मान करेगा। केवल युवा एकता को सर्वोच्च मानकर अनुभव और वरिष्ठ पीढ़ी की उपेक्षा करना समाज के लिए उचित नहीं हो सकता।

समाज को युवा और वृद्ध के संघर्ष में बाँटना अत्यंत घातक सिद्ध हो सकता है। स्वस्थ समाज वही होता है जहाँ युवाओं की ऊर्जा और वृद्धों का अनुभव मिलकर कार्य करें। यदि राजनीतिक लाभ के लिए पीढ़ियों के बीच विभाजन पैदा किया जाएगा, तो इससे सामाजिक संतुलन कमजोर होगा। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि समाज में परस्पर सम्मान, सहयोग और संवाद की भावना को बढ़ाया जाए, न कि टकराव और अपमान की भाषा को।