रामानुजगंज से उठी संविधान को तंत्र से मुक्त करने की आवाज
23 में प्रातःकालीन सत्र।
हम रामानुजगंज के कुछ साथियों ने देशभर के साथियों के साथ मिलकर दुनिया की प्रमुख समस्याओं के कारणों पर खोज की। 70 वर्षों की खोज के बाद हमारा यह निष्कर्ष निकला कि जब तक संविधान तंत्र से स्वतंत्र नहीं होता, तब तक कोई भी समाधान संभव नहीं है। क्योंकि यदि नाव की रस्सी पेड़ से बंधी हुई है, तो आप चाहे दिन-रात नाव चलाते रहिए, नाव चलती रहेगी और वहीं की वहीं रह जाएगी।
इसलिए जिस तरह नाव की रस्सी खोलना आवश्यक है, उसी तरह लोकतंत्र में तंत्र से बंधी हुई लोक की रस्सी को भी स्वतंत्र करना जरूरी है। लोकतंत्र दो शब्दों का मिलन है — लोक और तंत्र। आदर्श स्थिति में तो लोकतंत्र की पश्चिमी परिभाषा को अस्वीकार करके “लोक-नियंत्रित तंत्र” की परिभाषा स्वीकार करनी चाहिए, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यदि ऐसा संभव न हो, तो “लोक और तंत्र” यह परिभाषा बननी चाहिए, जिसमें लोक और तंत्र के बीच में संविधान रूपी एक पुल होना चाहिए। इसी पुल के माध्यम से ही दोनों एक साथ हो सकते हैं।
हम तत्काल पूरी दुनिया को तो यह संदेश नहीं दे सकते, लेकिन भारत से शुरुआत कर सकते हैं। वर्तमान समय में मां संस्थान ने इस संशोधित लोकतंत्र की परिभाषा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी स्वीकार की है। मां संस्थान का यह मानना है कि यदि लोकतंत्र की यह परिभाषा मान्य हो गई, तो दुनिया की सभी समस्याओं के समाधान के मार्ग खुल जाएंगे।
मेरा अपने सभी साथियों से निवेदन है कि दिन-रात नाव चलाने की अपेक्षा पेड़ से बंधी नाव की रस्सी को खोलने की शुरुआत करें। लोकतंत्र की सड़ी-गली परिभाषा को बदलने का समय आ गया है। संविधान को तंत्र के एकाधिकार से मुक्त कीजिए, समस्याओं के समाधान का मार्ग खुल जाएगा।
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