बेरोजगारी की नई परिभाषा: तर्कसंगत दृष्टिकोण की आवश्यकता
10 जून प्रातःकालीन सत्र
दुनिया में अनेक असत्य परिभाषाएँ प्रसारित कर दी गई हैं और वे परिभाषाएँ भारत में भी सत्य के समान मानी जाती हैं। उन्हें ही आधार बनाकर आगे की योजनाएँ बनती हैं, जबकि वे परिभाषाएँ ही पूरी तरह गलत हैं। हम इन सभी परिभाषाओं को तर्कसंगत स्वरूप दे चुके हैं और अब उन्हें दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।
ऐसी ही एक परिभाषा है बेरोजगारी। बेरोजगारी की वर्तमान परिभाषा पूरी तरह गलत है। रोजगार को आय के साथ जुड़ना चाहिए, लेकिन वर्तमान में जो परिभाषा बनी है, वह श्रम मूल्य के साथ नहीं जुड़ी है। हम लोगों ने बेरोजगारी की नई परिभाषा बनाई है। उसके अनुसार किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोषित न्यूनतम श्रम मूल्य पर योग्यता अनुसार काम का अभाव बेरोजगारी माना जाएगा।
भारत में वर्तमान समय में न्यूनतम श्रम मूल्य लगभग 250 रुपए घोषित है। यह न्यूनतम श्रम मूल्य अभी कम है, इसे 300 या 400 रुपए घोषित होना चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में जो श्रम मूल्य घोषित है, उसके आधार पर भारत में बेरोजगारों की संख्या नगण्य ही मानी जाएगी। यह भी संभव है कि यदि इस श्रम मूल्य को बढ़ा दिया जाए, तो कुछ लोग बेरोजगारों की श्रेणी में आ सकते हैं।
मुझे आश्चर्य है कि पढ़े-लिखे लोग, वकील, न्यायाधीश और नेता भी इन परिभाषाओं को सुधारने के लिए तैयार नहीं हैं। कोई इस पर चर्चा करने को तैयार नहीं है। ऐसी पश्चिम की अंध-गुलामी को हम भारत से चुनौती देने के लिए तैयार हैं।
हम यह गारंटी देते हैं कि न्यूनतम घोषित श्रम मूल्य पर योग्यता अनुसार काम देना हमारी जिम्मेदारी होगी।
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