बढ़ती-घटती आबादी के बीच सुख-दुख का प्रश्न
मेरा अपना अनुभव है कि सरकारें वास्तविक समस्याओं का समाधान करने के बजाय नकली समस्याओं का दिन-रात समाधान करती रहती हैं, जो वास्तव में समस्याएँ होती ही नहीं हैं। ऐसी भावनात्मक समस्याएँ समाज में फैला दी जाती हैं। समाज उन्हें महसूस करता है और फिर ये लोग उनके नकली समाधान का नाटक करते रहते हैं।
ऐसी ही एक समस्या जनसंख्या का बढ़ना और घटना भी है। मेरा जब जन्म हुआ था, तब भारत की आबादी कुल 25 करोड़ थी। आज भारत की आबादी 140 करोड़ है। क्या उस समय के लोग दुखी थे और आज सुखी हैं, अथवा क्या उस समय के लोग सुखी थे और आज दुखी हैं? ये दोनों ही बातें गलत हैं। सुख और दुख की जो मात्रा उस समय थी, वही मात्रा आज भी व्याप्त है।
स्पष्ट है कि आबादी का घटना या बढ़ना किसी समस्या का आधार नहीं है। यह केवल एक भावनात्मक समस्या है। जो भी व्यक्ति पैदा होता है, वह अपनी खपत के लायक उत्पादन भी करता है। इसलिए आबादी का बढ़ना कोई बड़ी समस्या नहीं है। जो भी व्यक्ति मरता है, वह अपनी खपत भी बंद कर देता है, इसलिए आबादी का घटना भी कोई समस्या नहीं है।
यह सब राजनेताओं का नाटक है, जिसमें हम सब उलझकर रह जाते हैं। कभी वे बढ़ी हुई आबादी को बड़ी समस्या बता देते हैं और कभी घटती हुई आबादी को समस्या घोषित कर देते हैं।
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