संविधान की नई परिभाषा: लोक और तंत्र के बीच सेतु

16 जून प्रातःकालीन सत्र

सारी दुनिया में संविधान शब्द की चर्चा बहुत होती है, लेकिन संविधान का अर्थ क्या होता है और उसकी उपयोगिता क्या है, यह बात आज तक साफ नहीं हो सकी है। इसलिए हम लोगों ने गहराई से विचार किया और संविधान की एक नई परिभाषा बनाई, जिसके अनुसार तंत्र के अधिकतम और लोक के न्यूनतम अधिकारों की सीमाएं तय करने वाले दस्तावेज को संविधान कहते हैं।

इस तरह हम लोगों ने संविधान और कानून को अलग-अलग किया है, जो वर्तमान में अलग-अलग बताए जाते हैं, लेकिन उनकी स्पष्ट परिभाषा नहीं है।

संविधान का मतलब है कि संविधान लोक द्वारा बनाया गया एक दस्तावेज है, जिसमें यह सीमा निर्धारित की गई है कि राज्य, समाज के सामाजिक मामलों में और व्यक्ति के व्यक्तिगत मामलों में किस सीमा तक हस्तक्षेप कर सकता है। यह सीमा लोक बनाता है और वही सीमा संविधान है।

इतनी साधारण बात आज तक दुनिया के समझ में नहीं आई कि संविधान की परिभाषा क्या होनी चाहिए। हम तंत्र को सारी शक्ति दे रहे हैं, लेकिन उस शक्ति की सीमाएं हम संविधान के माध्यम से निर्धारित कर रहे हैं।

इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से लोक और तंत्र के बीच एक पुल का काम संविधान करता है। यह भी कह सकते हैं कि लोक और तंत्र के बीच संविधान एक समझौता-पत्र है। आप कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन संविधान की परिभाषा तो अब बननी ही चाहिए।