स्वराज की वापसी: व्यवस्था परिवर्तन की दिशा

17 जून प्रातःकालीन सत्र।

वर्तमान दुनिया में अनेक परिभाषाएँ बदल दी गई हैं। इसी तरह स्वराज शब्द की परिभाषा भी बदल दी गई। स्वराज का अर्थ होता है प्रत्येक इकाई को इकाइगत निर्णय लेने तथा उन्हें क्रियान्वित करने की स्वतंत्रता। लेकिन स्वराज का अर्थ बदलकर राष्ट्रीय स्वराज तक सीमित कर दिया गया, जबकि यह परिभाषा पूरी तरह गलत है।

इस परिभाषा के बदल दिए जाने के कारण ही आज भारत में स्वराज नहीं, सुराज की बात हो रही है, जबकि सच्चाई यह है कि भारत में सुराज अभी तक आया ही नहीं है। साथ ही हमारा स्वराज भी चला गया। स्वराज का परिणाम होता है सुराज और सुराज का परिणाम होता है गुलामी।

गांधीजी लोक स्वराज के पक्षधर थे, जबकि नेहरूजी सुराज के। वर्तमान मोदी सरकार भी सुराज की दिशा में बढ़ रही है, स्वराज की दिशा में नहीं। सारी दुनिया का भी लगभग यही हाल है कि दुनिया सुराज को ही स्वराज कहती है, जबकि स्वराज बिल्कुल सुराज के विपरीत अवधारणा है।

इसलिए हम नई व्यवस्था में वास्तविक स्वराज की स्थापना करेंगे, राष्ट्रीय सुराज की नहीं। सुराज तो स्वराज के साथ अपने आप आ जाएगा।