नई व्यवस्था में मूल अधिकारों का पुनर्परिभाषण
18 जून प्रातःकालीन सत्र।
वर्तमान दुनिया में मूल अधिकारों की जो परिभाषाएँ बनी हुई हैं, वे गलत हैं। इसलिए हम लोग नई व्यवस्था में मूल अधिकारों को स्पष्ट परिभाषित करेंगे। हमारे विचार में मूल अधिकार सिर्फ एक होता है—सबकी असीम और समान स्वतंत्रता। इसके अतिरिक्त मूल अधिकार कोई होता ही नहीं है।
व्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा उसकी सहमति के बिना कोई अन्य बना ही नहीं सकता, क्योंकि उसकी तो सीमा प्राकृतिक रूप से बनी हुई है कि मूल अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के बराबर होते हैं। मूल अधिकार कभी कम या ज्यादा तब तक नहीं हो सकते, जब तक उसने सहमति न दी हो अथवा कोई अपराध न किया हो।
वर्तमान मूल अधिकारों की परिभाषाएँ अपूर्ण हैं या गलत हैं। किसी ने शिक्षा को मूल अधिकार घोषित कर दिया, किसी ने रोजगार को मूल अधिकार घोषित कर दिया। यह सब मूल अधिकार नहीं हैं। मूल अधिकार है असीम स्वतंत्रता, जीने का अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, व्यक्तिगत निर्णय का अधिकार। यही मूल अधिकार होते हैं और कोई अधिकार मूल अधिकार नहीं होता।
इसलिए हम नई व्यवस्था में मूल अधिकारों की एक साफ-साफ परिभाषा घोषित कर रहे हैं।
Comments