भारतीय संविधान और न्यायिक प्रक्रिया पर पुनर्विचार
3 जुलाई प्रातःकालीन सत्र। मैं लंबे समय से लिखता रहा हूं कि भारत का संविधान भी पश्चिमी देशों की नकल करके बनाया गया और भारत की न्याय व्यवस्था में भी पश्चिम की नकल की गई। आज तक हम ऐसे नकली लोकतंत्र को लेकर निरंतर आगे बढ़ रहे हैं, जो वास्तव में नकली है। सोनम रघुवंशी मामले ने यह बात उजागर कर दी है कि हमें अपनी न्यायिक प्रणाली पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। अपराधी ने खुद अपराध स्वीकार किया है। अपराधी ने सारे प्रमाण उपलब्ध कराए हैं। हमारी कार्यपालिका ने यह प्रमाणित कर दिया है कि सोनम अपराधी है। इसके बाद भी न्यायपालिका द्वारा अपराधी को रियायत देना यह सिद्ध करता है कि दोष न्यायाधीशों में नहीं है, न्यायपालिका में नहीं है, बल्कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया में है। यह सिद्धांत ही गलत है कि चाहे 99 अपराधी छूट जाएं, एक भी निरपराध दंडित न हो, क्योंकि किसी अपराधी का निर्दोष घोषित हो जाना स्वयं में एक अन्याय है। इसलिए हमारे भारतीय सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए। न कोई अपराधी छूटे, न कोई निर्दोष दंडित हो। इसके लिए हम न्यायपालिका में आमूल-चूल बदलाव करेंगे। पुलिस जिस व्यक्ति को अपराधी घोषित कर देगी और प्रमाणित कर देगी, उसके लिए यह बाध्यकारी होगा कि वह न्यायालय में जाकर अपने को निर्दोष सिद्ध करे। पुलिस का काम दोषी सिद्ध करना नहीं होगा। पुलिस को हम न्याय-सहायक मानेंगे, पक्षकार नहीं। हम पूरी न्यायिक प्रक्रिया को बदल देने के पक्षधर हैं। यदि न्यायिक प्रक्रिया हमारे तरीके से सुधार दी जाएगी, तो तत्काल न्याय होगा, सही न्याय होगा, न्याय सस्ता होगा और न्याय विश्वसनीय होगा।
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