समाज सर्वोच्च: समाजवाद की पुनर्परिभाषा की आवश्यकता

30 जून, प्रातःकालीन सत्र

दुनिया में अनेक शब्दों की परिभाषाएँ जानबूझकर बदल दी गईं। उनमें धर्म, संविधान, महंगाई, बेरोजगारी और अन्य परिभाषाएँ भी शामिल रही हैं। ऐसी ही एक परिभाषा समाज की भी बदली गई और उसी तरह एक समाजवाद शब्द पैदा किया गया।

वास्तव में समाजवाद का अर्थ होता है समाज सर्वोच्च। समाज शब्द धर्म और राष्ट्र से भी ऊपर होता है। समाज शब्द में जाति, संगठन या अन्य किसी भी प्रकार की कोई सीमाएँ नहीं होतीं। लेकिन समाजवाद शब्द बनाकर उस परिभाषा को विकृत किया गया। समाजवाद शब्द जानबूझकर शुरू किया गया। इसका उद्देश्य क्या था, यह तो अलग प्रश्न खड़ा होता है।

क्योंकि जिस तरह साम्यवाद की लहर दुनिया में चल रही थी, उसका मुकाबला करने के लिए यदि समाजवाद शब्द बना होगा, तो वह एक अलग स्थिति थी, जो अब नहीं है। और यदि समाज शब्द को विकृत करने के लिए समाजवाद शब्द बना, तो यह बहुत ही निंदनीय कार्य है।

कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन अब समाजवाद शब्द की या तो वास्तविक परिभाषा प्रचलित की जानी चाहिए अथवा समाजवाद शब्द को विलोपित कर देना चाहिए, क्योंकि वर्तमान भारत में समाजवाद शब्द भ्रम पैदा कर रहा है, नुकसान कर रहा है।

इसलिए मेरा यह विचार है कि या तो हम मिल-जुलकर समाजवाद की "समाज सर्वोच्च" परिभाषा प्रस्तुत करें अथवा समाजीकरण नाम से एक नए शब्द को तैयार करें।