मानवाधिकार की आड़ में अपराधियों का समर्थन?
वर्तमान भारत में हम समाज के लोग सिर्फ अपराधियों से ही परेशान नहीं हैं, बल्कि हमारे बीच में घुसे हुए ऐसे अपराधियों के पक्ष के लोग भी हमें भ्रमित करते हैं। ऐसे लोग मानवाधिकार के पक्षधर हो जाते हैं, ऐसे लोग न्याय के पक्षधर हो जाते हैं, जबकि इनका न मानवाधिकार से कोई लेना-देना है, न न्याय से कोई लेना-देना है।
अभी-अभी कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश का एक खतरनाक डकैत जगन गुर्जर राजस्थान की किसी जेल में अवैध तरीके से मारा गया। जगजाहिर है कि वह राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में आतंक मचा कर रखा था। कोई भी मानवाधिकारवादी उस डकैत और अपराधी के खिलाफ कभी एक शब्द भी नहीं बोलता था, बल्कि हमेशा इस प्रकार के मानवाधिकारवादी सरकार की ही आलोचना करते थे कि आप उस डकैत को नहीं रोक पा रहे हैं। लेकिन जब वह डकैत अवैध तरीके से राजस्थान में मारा गया, तब ये अपराधियों के मददगार अब घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं। बेचारा निहत्था था, उसे जेल में मार दिया गया। जरूर कोई-न-कोई सरकार की योजना रही होगी। वह तो बेचारा दीन-दुखियों की सेवा करता था। वह तो बेचारा जो माल लूटता था, वह लोगों में बाँट देता था।
इस प्रकार अपराधों के पक्षधर जिस तरह जगन गुर्जर के लिए आँसू बहा रहे हैं, इस प्रकार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। अपराधों में नियंत्रण के लिए अपराधियों के सफेदपोश पक्षकारों से भी हमें सावधान रहना चाहिए।
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