संविधान, संसद और सत्ता का संतुलन: लोकतंत्र पर पुनर्विचार

हम आज वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। लोकतंत्र को आदर्श तभी माना जा सकता है, जब उसमें किसी प्रकार की सेना के दुरुपयोग की गुंजाइश भी कम हो और संविधान संशोधन के असीम अधिकार भी किसी एक इकाई के पास न हों।

अब आप भारतीय संविधान पर विचार कीजिए। यदि भारत में संसद तानाशाह बन जाए, तो आप उसे कैसे रोक सकते हैं? क्योंकि संसद को संविधान संशोधन के असीम अधिकार प्राप्त हैं और समय-समय पर संसद ने इसका दुरुपयोग भी किया है। क्या यह लोकतंत्र है कि संसद को संविधान संशोधन के असीम अधिकार प्राप्त हों? संसद न्यायपालिका को भी अपने नियंत्रण में कर सके और कार्यपालिका को भी।

पहला प्रश्न यही खड़ा होता है कि क्या संसद के संविधान संशोधन के अंतिम अधिकारों में कोई और नई व्यवस्था आवश्यक है? दूसरा प्रश्न यह भी उठता है कि जब न्यायपालिका ने एक बार संविधान के मूल ढाँचे की बात कह दी, तो संविधान का मूल ढाँचा क्या है, यह कौन तय करेगा? न्यायपालिका यह तय नहीं कर सकती और संसद यह तय करेगी नहीं।

एक प्रश्न यह आता है कि यदि कभी सेना के दुरुपयोग करने की नौबत आ जाए, तो क्या भारत में उसकी कोई ऐसी व्यवस्था है, जिससे कोई भी एक इकाई इस तरह का प्रयोग न कर सके? यदि है, तो इस पर चर्चा होनी आवश्यक है।

बताया जाता है कि राष्ट्रपति सेना के प्रमुख होते हैं, लेकिन वर्तमान संविधान में 1971 के बाद राष्ट्रपति को रबर स्टैंप बना दिया गया है। यह बात भी विचार करने योग्य है कि वर्तमान समय में संविधान संशोधन के मामले में और सेना के दुरुपयोग के मामले में राष्ट्रपति के पास कितनी शक्ति बची है।

इसलिए मेरा यह सुझाव है कि सत्ता के इतने अधिक केंद्रीकरण पर हमें फिर से नए तरीके से सोचना चाहिए। सुलभ व्यावहारिकता को थोड़ा-सा आदर्श की दिशा में बढ़ाकर दोनों के बीच तालमेल आवश्यक है।

हम आज दिन भर लोकतंत्र और संविधान पर चर्चा कर रहे हैं। हम अंतिम रूप से यह निष्कर्ष निकाल चुके हैं कि लोकतंत्र में अब विश्वव्यापी संशोधन करने की आवश्यकता है और उस संशोधन की शुरुआत भारत से ही हो सकती है।

दूसरी बात यह है कि हम किसी भी परिस्थिति में तानाशाही का खतरा नहीं उठा सकते। इसलिए हम संविधान संशोधन के संबंध में संसद या न्यायपालिका के असीम अधिकारों पर किसी-न-किसी तरह का अंकुश लगाना चाहते हैं।

इन दोनों परिणामों को प्राप्त करने के लिए हम चाहते हैं कि लोकतंत्र में सुधार करके हम संसदीय लोकतंत्र की जगह सहभागी लोकतंत्र अर्थात लोक स्वराज की दिशा में आगे बढ़ें।

हम दूसरा प्रयत्न यह कर रहे हैं कि राष्ट्रपति के अधिकार फिर से संविधान में शामिल हों। तीसरा, न्यायपालिका का हस्तक्षेप कम होना चाहिए। चौथा, संविधान के मूल ढाँचे की एक स्पष्ट व्याख्या होनी चाहिए। पाँचवाँ, आपातकाल लगाने या सेना के हस्तक्षेप को अधिक व्यावहारिक स्वरूप दिया जाना चाहिए।

इन सब परिणामों को प्राप्त करने के लिए ही हम एक राष्ट्रीय संविधान सभा बना रहे हैं, जो इन सभी विषयों पर विचार करके अपने सुझाव देगी। 25 और 26 जुलाई को अयोध्या में आयोजित सम्मेलन में भी इन सभी विषयों पर विचार होगा और आगे की योजना बनेगी।