एन ए पीएम और संयुक्त मोर्चा: घटते जनाधार की राजनीति
मैंने एक सामाजिक संस्था को नजदीक से देखा है, जिसका नाम एन.ए.पी.एम. है। इस संस्था या संगठन में जो भी लोग शामिल होते हैं, वे व्यक्तिगत रूप से अथवा संस्थागत रूप से किसी आंदोलन या जनजागरण में पूरी तरह फेल हो जाते हैं। ऐसे सारे फेल लोग एन.ए.पी.एम. के सदस्य बन जाते हैं।
जब भी इनका कोई सदस्य आंदोलन करता है, तो एन.ए.पी.एम. के लोग उस आंदोलन में शामिल हो जाते हैं और ऐसा सिद्ध करते हैं, जैसे सैकड़ों संस्थाएँ इस आंदोलन में शामिल हैं, जबकि वास्तव में कुछ नहीं होता है। एक किसान आंदोलन को छोड़कर और कोई ऐसा सफल आंदोलन नहीं हुआ, जिसमें इन लोगों ने कोई उल्लेखनीय बदलाव किया हो। यह एन.ए.पी.एम. अब प्रभाव खोता जा रहा है।
ठीक इसी तरह की स्थिति राजनीति में भी है। जो राजनीतिक दल अपना प्रभाव खोते जा रहे हैं, वे असफल नेता या वे असफल दल मिलकर एक संयुक्त विपक्षी दल बना रहे हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है। लेकिन यह एक साथ बैठकर जनता के बीच यह प्रभाव देना चाहते हैं कि हम अनेक दलों के लोग एकजुट होकर मोदी को चुनौती देंगे।
इनमें कांग्रेस को छोड़कर अन्य राजनीतिक दलों का अस्तित्व नगण्य होता जा रहा है। उनकी मजबूरी है कि इनका स्वतंत्र अस्तित्व सिर्फ संयुक्त मोर्चे के नाम पर ही जिंदा रह सकता है, अन्यथा यह इतिहास बन जाएंगे।
सभी असफल नेता वर्तमान समय में इसी तरह एक-दूसरे के साथ जुटकर असफल नेताओं का एक समूह बनाने के लिए मजबूर हो गए हैं। एन.ए.पी.एम. और संयुक्त मोर्चा ऐसे ही मरणासन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का एक समूह हैं।
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