धरना-प्रदर्शन से आगे: विरोध का नया रास्ता
22 जुलाई, प्रातःकालीन सत्र
हम दो-तीन दिनों से दिल्ली में धरना-प्रदर्शनों की बाढ़ देख रहे हैं। पहली बात तो यह है कि क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी का कोई अर्थ हमारे संविधानविद् आज तक समझ पाए हैं? मेरे विचार से नहीं।
अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब सिर्फ इतना ही है कि आप अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं, कोई क्रिया व्यक्त नहीं कर सकते। विचार और क्रिया, इन दोनों में फर्क होता है। आंदोलन करना क्रिया है, नारे लगाना क्रिया है। इसलिए यदि आप कोई क्रिया करते हैं, तो वह आपके नागरिक अधिकार हो सकते हैं, मूल अधिकार नहीं।
दूसरा प्रश्न यह भी पैदा होता है कि यदि कोई आम नागरिक किसी सरकार, व्यवस्था या संविधान के विरुद्ध अपना विरोध व्यक्त करना चाहता है, तो उसके पास वर्तमान समय में क्या माध्यम है? मेरी समझ में अभी कोई माध्यम नहीं है।
आपके पास अभी तीन माध्यम हैं—या तो आप संसद के माध्यम से जा सकते हैं, अथवा न्यायालय के माध्यम से जा सकते हैं, अथवा आंदोलन के माध्यम से जा सकते हैं। तीनों ही माध्यमों का लोग प्रयोग कर रहे हैं।
मेरे विचार से इन तीनों के अतिरिक्त कोई संवैधानिक माध्यम भी होना चाहिए, जिसके माध्यम से हम अपना विरोध व्यक्त कर सकें। हम इस तरह का एक अलग माध्यम बनाने के पक्षधर हैं। हम संसद, न्यायालय और आंदोलन—तीनों माध्यमों को रिजेक्ट करके एक नए माध्यम पर सोच रहे हैं।
ऐसे कौन-कौन से माध्यम हो सकते हैं, उन सब पर हम शीघ्र ही अपने प्रस्ताव समाज के सामने प्रस्तुत करेंगे।
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