नई समाज व्यवस्था में स्वतंत्रता, निजता और सहजीवन का संतुलित मॉडल

2 अगस्त प्रातःकालीन सत्र।

सारी दुनिया में अराजकता का प्रमुख कारण यह है कि दुनिया में अब तक निजता और सहजीवन की सीमाएँ बनाई नहीं गई हैं। वर्तमान में जो सीमाएँ बनी हुई हैं, वे गलत हैं क्योंकि स्वतंत्रता और सामूहिकता दोनों का एक संतुलन बिंदु होना चाहिए। लेकिन दुनिया में एक तरफ अधिकतम स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, दूसरी तरफ अधिकतम सामाजिकता के भी पक्षधर हैं, और इन दोनों विचारधाराओं के बीच टकराव चलता रहता है।

मेरा यह विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति की सहमति के बिना उसकी स्वतंत्रता में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचाई जानी चाहिए, जब तक कि उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुँचाई हो। दूसरी तरफ, जब वह व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ जुड़कर सामाजिक संबंध बना लेता है, तब उसकी स्वतंत्रता संयुक्त हो जाती है और व्यावहारिक धरातल पर शून्य हो जाती है। उस स्थिति में उसे कोई स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार ही नहीं होता।

इस तरह यदि हम एक नई परिभाषा तैयार करेंगे, तो स्वतंत्रता और सामाजिकता के बीच एक संतुलन पैदा होगा। वर्तमान समय में समाज व्यक्ति की स्वतंत्रता में अनावश्यक हस्तक्षेप करता है और व्यक्ति समाज की शक्ति को स्वीकार ही नहीं करता है। इन दोनों के बीच लगातार टकराव चलता रहता है, जो अच्छी बात नहीं है।

मेरे विचार से व्यक्ति को परिवार के साथ जुड़ना अनिवार्य कर दिया जाए और परिवार के पारिवारिक मामलों में, बिना उसकी सहमति के, समाज कोई हस्तक्षेप न करे। इस प्रकार की सीमाएँ स्पष्ट की जा सकती हैं।