महिला-पुरुष संबंधों में सरकारी हस्तक्षेप से बढ़ रही सामाजिक अव्यवस्था
14 जुलाई प्रातः कालीन सत्र। कल हम लोगों ने चर्चा की थी कि किस तरह नशे में हस्तक्षेप करके सरकार ने सारी सामाजिक व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया है। आज हम नशे से भी कई गुना अधिक बड़ी समस्या पर चर्चा कर रहे हैं कि महिला-पुरुष के आपसी संबंधों के मामलों में सरकार ने अनावश्यक हस्तक्षेप करके एक बहुत बड़ी समस्या पैदा कर दी है। महिला और पुरुष के बीच आपसी संबंध कैसे हों, यह वे दोनों तय करेंगे, परिवार तय करेगा, समाज तय करेगा, धर्म तय करेगा। राज्य कौन होता है तय करने वाला?
मैंने एक सर्वे किया तो यह पाया कि एक लाख की आबादी में कहीं वर्ष भर में एक-दो बलात्कार होते हैं, लेकिन सरकार के गलत कानून के आधार पर बलात्कारों की अनावश्यक संख्या बढ़ जाती है या बढ़ा दी जाती है। सरकार के गलत कानूनों के कारण आज बलात्कार के नाम पर हत्याएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। परिवार इसलिए टूट रहे हैं कि महिला और पुरुष के आपसी संबंधों की व्याख्या सरकार कर रही है, जो कि परिवार का काम था, धर्म का काम था, समाज का काम था।
इसलिए हम नई व्यवस्था में चाहते हैं कि सरकार बल प्रयोग और धोखाधड़ी को छोड़कर बाकी किसी भी मामले में महिला-पुरुष संबंध के विषय में न हस्तक्षेप करे, न कानून बनाए। कौन कब विवाह करता है, किस उम्र में करता है, कब तलाक देता है, इससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। सरकार ने मूर्खतापूर्ण दहेज कानून बनाया, जिसका कोई उपयोग नहीं था। आज तक सरकार ने इस प्रकार के कानून से सामाजिक समस्याओं को पैदा ही किया है और बढ़ाया ही है।
इसलिए हम चाहते हैं कि सरकार जितना काम करने की क्षमता रखती है, उतना काम अपने पास रखे और बाकी सारा काम परिवार, समाज और धर्म पर छोड़ दे। हम सरकार की तुलना में अधिक सफलतापूर्वक इन समस्याओं का समाधान कर लेंगे।
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