महिला, दलित और आदिवासी अधिकारों पर नई बहस जरूरी
हम कल घटित महिला पुरुष की घटनाओं पर विचार करें तो एक पति ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी उसे टुकड़े-टुकड़े करके फ्रिज में रख दिया क्योंकि उसे संदेह था कि उसकी पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ भी संपर्क में है एक दूसरी घटना में एक बहू ने अपने ससुर की हत्या के लिए दो नौकरों को 6 लाख रुपया देकर अपने अरबपति ससुर की इसलिए हत्या कराई कि ससुर खर्च करने में कंजूसी कर रहा था। एक तीसरी घटना में भी एक महिला ने एक दुकानदार पर यह आरोप लगा दिया उस दुकानदार ने अपनी दुकान के पीछे ले जाकर उस महिला के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की एक चौथी घटना में फ्रांस में एक स्वामीनारायण संप्रदाय का आयोजन होता है स्वामीनारायण के लोग उस आयोजन में महिला कर्मचारियों को रखने के पक्षधर नहीं है जिस जगह आयोजन हो रहा था वहां के महिला कर्मचारियों को इस आयोजन से अलग कर दिया गया तो महिला कर्मचारियों ने इसका विरोध किया और हड़ताल कर दी समझ में नहीं आ रहा है कि हम भारत के लोग पश्चिम के महिला सशक्तिकरण के नारे का आंख बंद करके समर्थन क्यों कर रहे हैं। बलात्कार के झूठे आरोप क्यों लगाए जा रहे हैं दलित उत्पीड़न आदिवासी उत्पीड़न के भी झूठे आरोप अधिक संख्या में लग रहे हैं। न्यायालय से भी जो निर्णय आ रहे हैं उसमें अधिकांश आरोप झूठ पाए जा रहे हैं लेकिन इसमें ना हमारे समाज व्यवस्था की गलती है ना महिलाओं की आदिवासियों की दलितों की गलती है बल्कि इसमें गलती है कानून बनाने वालों की क्योंकि उन्होंने ही ऐसा कानून बनाया है कि जो महिलाएं आदिवासी दलित बलात्कार और अत्याचार के आरोप लगाएंगे उन्हें प्रोत्साहन के लिए सरकार से आर्थिक मदद मिलेगी। एक तरफ उन्हें प्रोत्साहन राशि मिलेगी दूसरी ओर उनकी ब्लैकमेल करने की ताकत भी बढ़ेगी। आप फ्रांस की घटना पर भी विचार करिए तो पश्चिम से अंधाधुंध महिला सशक्तिकरण की आवाज बहुत घातक है महिलाओं को यह तय करना पड़ेगा कि उन्हें समान अधिकार चाहिए अथवा विशेष अधिकार चाहिए। दलित और आदिवासियों को भी यह साफ-साफ घोषणा करनी होगी कि उन्हें समान अधिकार चाहिए या विशेष अधिकार चाहिए दोनों अधिकार आपको एक साथ नहीं मिल सकते इसलिए मैं भारत में इस विचार का पक्षधर हूं कि इस विषय पर अंतिम रूप से विचार कर लिया जाए कि कमजोरों को संविधान और कानून में समान अधिकार चाहिए अथवा विशेष अधिकार।
Comments