कलयुग से सतयुग की ओर: संशोधित सामाजिक व्यवस्था का संकल्प
वर्तमान दुनिया में ऐसा माना जा रहा है कि कलयुग आ गया है और कलयुग का अंतिम चरण है। मान लीजिए कि यदि कलयुग आ भी गया है, तो अब इस कलयुग को सतयुग में बदलने की जिम्मेदारी हमारी-आपकी ही है। स्पष्ट है कि दुनिया में एक संशोधित सामाजिक व्यवस्था बननी चाहिए, जिसमें पुरानी बुराइयाँ दूर हो जाएँ और समाज व्यवस्था संशोधित हो जाए।
हम यह मानते हैं कि दुनिया की अनेक समस्याएँ राजनीतिक बुराइयों का बाय-प्रोडक्ट हैं और वे अपने आप समाप्त हो सकती हैं, यदि हम दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था में कुछ बदलाव कर सकें। हम लोगों ने इस कार्य की जिम्मेदारी स्वीकार की है। हम दुनिया भर में एक नई संशोधित समाज व्यवस्था का प्रारूप रख रहे हैं।
इस कार्य के लिए हम तीन अलग-अलग संस्थाएँ बना रहे हैं। पहली संस्था है—एक संविधान सभा। यह संविधान सभा दुनिया भर की अलग-अलग इकाइयों के संविधान का प्रारूप समाज के सामने रखेगी। दूसरी इकाई है—परिवार सभा। परिवार व्यवस्था में आई बुराइयों के लिए हम संशोधित प्रस्ताव रखेंगे। और तीसरी है—विचार सभा। एक स्वतंत्र विचारकों का समूह बनना चाहिए, जो किसी विचारधारा से प्रतिबद्ध न हो।
यदि हम तीन दिशाओं में सक्रिय हो सके, तो समाज की सभी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है, क्योंकि सभी समस्याओं का समाधान इन तीनों संस्थानों के माध्यम से ही ठीक हो सकता है। माँ संस्थान इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है। अब हम इस वर्तमान कलयुग में जीने के लिए मजबूर नहीं रहेंगे, बल्कि हम सतयुग की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।
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