नेहरूवादी मॉडल से गांधीवादी स्वराज की ओर
यह बात साफ दिखाई देती है कि भारत का विपक्ष पूरी तरह निराश हो गया है। अब तो अधिकांश विपक्षी दल इस उम्मीद पर जीवित हैं कि समय बदलता है और समय बदलेगा तो कभी उनका भी दौर आएगा।
बात भी सही है। एक समय था जब मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने से पहले तक नेहरू परिवार अधिक सरकारी नियंत्रण वाली व्यवस्था का समर्थक था। अधिक से अधिक कर लगाकर और अधिकाधिक क्षेत्रों को सरकारी नियंत्रण में रखकर अर्थव्यवस्था संचालित करने की नीति अपनाई गई। बैंक सरकारी थे, अनेक उद्योग सरकारी थे और कई क्षेत्रों में सरकार की भूमिका प्रमुख थी। इस व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि सरकारी नौकरियों का महत्व लगातार बढ़ता गया।
मेरे विचार से मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत करके इस दिशा में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। इसके बाद नरेंद्र मोदी की सरकार ने भी निजीकरण और सरकारी नियंत्रण को कम करने की दिशा में कई कदम उठाए। अब सरकारी कर्मचारियों की संख्या सीमित करने, सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश तथा निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने पर अधिक बल दिया जा रहा है।
मैं चाहता हूँ कि भारत सरकार और अधिक तेज गति से निजीकरण करे तथा भारत को नेहरूवादी आर्थिक सोच की छाया से पूरी तरह मुक्त किया जाए। मेरा मानना है कि भारत को नेहरू के विचारों के बजाय गांधी के विचारों के अनुरूप अधिक स्वावलंबी और विकेंद्रीकृत व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहिए। मेरे अनुसार, नेहरू की समाजवादी आर्थिक नीतियों ने भारत को काफी नुकसान पहुँचाया है। भारत को सरकारी नौकरियों की अपेक्षा स्वतंत्र, आत्मनिर्भर किसानों और उद्यमियों की अधिक आवश्यकता है।
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