जंतर-मंतर आंदोलन की असफलता: एक वैचारिक शक्ति-परीक्षण का परिणाम
कल का जंतर-मंतर का आंदोलन एक ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज किया जाएगा। पहली बार साम्यवादियों का इतना योजनाबद्ध आंदोलन असफल हुआ है। अब तक साम्यवादी यदि कोई जन-आंदोलन करते हैं, तो वह इतनी योजना और सूझबूझ से करते हैं कि वह सफल होता ही है, क्योंकि वे उसे कभी पार्टी के अंतर्गत नहीं करते, बल्कि 5-10 वर्षों में एक बार करते हैं और उस आंदोलन को जन-आंदोलन का स्वरूप दे देते हैं।
ऐसा ही हमने निर्भया के समय भी देखा था और ऐसा ही आंदोलन रोहित वेमुला के समय भी हुआ। विनेश फोगाट के आंदोलन को भी आंशिक रूप से इस तरह का स्वरूप दिया गया था और इन सभी आंदोलनों में कम्युनिस्टों को सफलता मिली। पूरे देश भर में कानूनों में बदलाव हुए। लेकिन कल पहली बार यह आंदोलन असफल हुआ है।
इस आंदोलन के पीछे कम्युनिस्टों की तीन भावनाएँ काम कर रही थीं। पहला, यह एक जैन जी आंदोलन बने, जिसके नाम पर युवाओं को देशभर में आंदोलित किया जा सके। दूसरा, इस आंदोलन के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को दुनिया भर में कमजोर किया जा सके, क्योंकि वर्तमान समय में जस्टिस सूर्यकांत इन सबकी नजरों पर चढ़े हुए हैं। तीसरा उद्देश्य था कि वर्तमान समय में जो हिंदू-मुसलमान के रूप में भारत बंट रहा है, उस दिशा को मोड़कर गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई के नाम पर मजबूत कर दिया जाए।
इन तीनों उद्देश्यों को जोड़कर ही यह आंदोलन खड़ा किया जा रहा था। इस आंदोलन में कोई विपक्षी नेता शामिल नहीं हुआ। कम्युनिस्ट भी शामिल नहीं हुए। केवल एक वांगचुक और दीपांकर भट्टाचार्य व्यक्तिगत रूप से आए, संगठनात्मक स्वरूप में नहीं। अन्य सारे दल दूर से आंदोलन की सफलता की कामना कर रहे थे।
सरकार ने भी यह अच्छा किया कि इस आंदोलन की असफलता का सवेरे ही आकलन करके इसकी हवा निकाल दी। किसी प्रकार का कोई टकराव सामने आने ही नहीं दिया। कम्युनिस्ट इस बात की भरपूर कोशिश कर रहे थे कि सरकार गिरफ्तारी करे, बाधा उत्पन्न करे और उस नाम पर सभी नेता लोग कूद पड़ें, लेकिन सरकार ने प्रारंभिक आकलन ठीक दिशा में किया। परिणाम यह हुआ कि पहली बार कम्युनिस्ट अपनी समीक्षा कर रहे हैं।
कम्युनिस्टों को इस बात का दुख है कि इस आंदोलन का नेतृत्व एक नासमझ व्यक्ति कर रहा था और वह मनमाने निर्णय ले रहा था। लेकिन कम्युनिस्टों को इस बात का भी दुख है कि सरकार ने इस आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया। वहीं भारत की आम जनता को इसलिए खुशी है कि पहली बार कम्युनिस्टों का घमंड टूटा है। जैन जी के विदेशी नाम के आधार पर कम्युनिस्ट घमंड कर रहे थे, उसका प्रभाव देखकर वे अपनी बगलें झाँक रहे हैं।
कल का जंतर-मंतर का आंदोलन हम लोगों और उन लोगों के बीच एक शक्ति-परीक्षण था। हम लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि हमारी सबसे बड़ी समस्या हिंदू-मुसलमान की है। कई सौ वर्षों से मुसलमानों ने लगातार सांप्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन भी करवाया और हिंदुत्व को लगातार कमजोर किया। स्वतंत्रता के बाद भी लगातार इस्लाम मजबूत होता गया और हिंदुत्व को दबाता चला गया।
हम सारी समस्याओं में सबसे प्रमुख कारण हिंदू-मुसलमान के अनुपात में गिरावट को मानते थे। दूसरी ओर, वे लोग यह मानते थे कि सारी समस्याओं का मुख्य कारण गरीबी, महंगाई, अशिक्षा और बेरोजगारी है। जब तक भारत में बेरोजगारी, अशिक्षा और महंगाई रहेगी, तब तक भारत इसी तरह पिछड़ा रहेगा। भारत में इसी तरह शोषण होता रहेगा।
इन दोनों विचारधाराओं के बीच लंबे समय से टकराव चला आ रहा है और लगातार वे लोग इस टकराव में जीतते रहे हैं। पहली बार कल यह सिद्ध हुआ कि हम वास्तव में सही हैं और वे लोग गलत हैं। यह बात भी प्रमाणित हुई है कि भारत को युवा और वृद्ध में, दलित और सवर्ण में विभाजित करना पूरी तरह गलत है। हम लंबे समय से इस बात को गलत मानते रहे और वे लोग लंबे समय से इसे अपनी सफलता का माध्यम बनाते रहे।
यही कारण है कि कल के आंदोलन की असफलता से उन लोगों का चेहरा गिरा हुआ है और हम लोग पूरी तरह प्रसन्न हैं। अब भारत हम लोगों के मार्ग पर चलेगा, उन लोगों के मार्ग पर नहीं।
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