यह स्पष्ट किया गया कि व्यवस्था चाहे कोई भी क्यों न हो, ...
1 फरवरी के प्रातःकालीन सत्र में यह स्पष्ट किया गया कि व्यवस्था चाहे कोई भी क्यों न हो, जब वह रूढ़ हो जाती है त...
1 फरवरी के प्रातःकालीन सत्र में यह स्पष्ट किया गया कि व्यवस्था चाहे कोई भी क्यों न हो, जब वह रूढ़ हो जाती है त...
पिछले तीन–चार दिनों से यूजीसी से जुड़े जिस प्रकार के घटनाक्रम सामने आए, वे मेरे लिए किसी स्वप्न जैसे थे।...
29 जनवरी, प्रातःकालीन सत्रवर्तमान स्थिति में हमें समाज में अराजकता दिखाई देती है। इसका मुख्य कारण यह है कि राज...
28 जनवरी, प्रातःकालीन सत्रहम नई समाज व्यवस्था में बेरोजगारी की वर्तमान परिभाषा को पूरी तरह बदल देंगे। हमारे आध...
मैंने आज एक प्रसिद्ध विद्वान विपिन पब्बी का एक लेख पढ़ा। इस लेख में उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है क...
नई समाज व्यवस्था पर चर्चाकल मैं रायपुर शहर से कुछ दूर स्थित आनंद धाम अपने मित्र से मिलने गया था। आनंद धाम वह स...
दुनिया में व्यक्ति और समाज के संबंध इतने जटिल और उलझे हुए हैं कि उन्हें पूरी तरह सुलझाकर समझाना अत्यंत कठिन का...
15 नवंबर, प्रातःकालीन सत्र हम प्रतिदिन सुबह नई समाज व्यवस्था पर चर्चा करते हैं। मैं अपने जीवन के अनुभव इसी प्...
14 नवंबर — प्रातःकालीन सत्र नई व्यवस्था में समाज व्यवस्था और राज्य व्यवस्था को स्पष्ट रूप से अल...
12 नवंबर, प्रातःकालीन सत्र जब हम किसी व्यक्ति को अधिकार प्रदान करते हैं, तो वे अधिकार उसकी शक्ति बन जाते हैं &...
संशोधित संस्करण: हम आज प्रातः से नई समाज व्यवस्था पर चिंतन कर रहे हैं। हमारी समग्र व्यवस्था सदैव समाज और राज्...
पिछले दो दिनों में मैंने महिला–पुरुष संबंधों के संदर्भ में हमारे धर्मगुरुओं और राजनेताओं की भूमिका पर आं...