माँ संस्थान का चार सूत्रीय संकल्प: समाज सशक्तिकरण की नई दिशा
पाँच दिनों के माँ संस्थान द्वारा आयोजित शिविर में हम अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संस्थान के रूप में अपनी सक्रियता को चार प्रमुख दिशाओं तक सीमित रखा जाएगा।
पहली दिशा है—एक संविधान सभा का गठन।
दूसरी दिशा है—ज्ञान यज्ञ परिवार का गठन।
तीसरी दिशा है—एक स्वतंत्र विचार मंथन समूह का निर्माण।
चौथी दिशा है—इन तीनों संस्थागत प्रयासों के समन्वय के लिए देशभर में ज्ञान केंद्रों की स्थापना। संस्थानिक रूप से हम अपनी सक्रियता इन चार क्षेत्रों तक सीमित रखेंगे, किंतु वैचारिक स्तर पर अन्य विषयों पर भी निरंतर चर्चा करते रहेंगे।
हम साम्यवादी विचारधारा और इस्लाम के संगठनवादी स्वरूप के प्रति सावधान रहेंगे। इन दोनों के प्रभाव से समाज को बचाने हेतु प्रशिक्षण देने का प्रयास करेंगे। साथ ही हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि हिंदुत्व को साम्यवादी प्रवृत्तियों और अति-संगठनवादी चरित्र से सुरक्षित रखा जाए।
हम किसी भी प्रकार के वर्ग-संघर्ष का समर्थन नहीं करेंगे। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, आयु, लिंग, गरीब-अमीर, किसान-मजदूर, उत्पादक-उपभोक्ता, शहरी-ग्रामीण आदि किसी भी प्रकार के वर्ग-भेद को निरुत्साहित किया जाएगा और वर्ग-समन्वय को प्रोत्साहित किया जाएगा।हम यह भी प्रयास करेंगे कि धर्म का राजनीति में और राजनीति का धर्म में हस्तक्षेप न्यूनतम हो। साथ ही राज्यशक्ति को सुरक्षा और न्याय तक सीमित रखने तथा अन्य कार्य समाज को सौंपने के विचार को आगे बढ़ाया जाएगा।
समाज सशक्तिकरण और राज्य-सीमितकरण के सिद्धांत को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
इस प्रकार, माँ संस्थान ने अपनी प्राथमिकताओं और कार्य-दिशाओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दिया है।
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