लोकतंत्र में समस्याओं का चक्र और राज्य की भूमिका

8 मार्च, प्रातःकालीन सत्र।
राज्य के प्रमुख नाटकों पर चर्चा

दुनिया भर के राज्य प्रायः इस प्रकार प्रयास करते हैं कि वर्तमान समस्याओं का ऐसा समाधान प्रस्तुत किया जाए, जिससे स्वयं उस समाधान से ही कई नई समस्याएँ पैदा हो जाएँ। क्योंकि यदि समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, तो लोगों की राज्य पर निर्भरता भी कम हो जाएगी। इसलिए राज्य एक ओर समस्याओं का समाधान करता हुआ दिखाई देता है, लेकिन दूसरी ओर वे पूरी तरह समाप्त भी नहीं होतीं।

भारत में भी कुछ हद तक यही स्थिति दिखाई देती है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अक्सर ऐसा होता है कि किसी समस्या को हल करने के लिए जो कदम उठाए जाते हैं, उनसे नई समस्याएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। परिणामस्वरूप समस्याओं का एक सिलसिला बना रहता है।

आज भारत में जो भी समस्याएँ हल करने की कोशिशें हो रही हैं, उनके समाधान के साथ-साथ नई-नई चुनौतियाँ भी सामने आ रही हैं। शायद ही कोई ऐसी समस्या हो जिसका समाधान किसी दूसरी समस्या को जन्म न दे रहा हो। यही कारण है कि भारत का सामान्य नागरिक स्वयं को लगातार समस्याओं में उलझा हुआ अनुभव करता है।

जबकि कई बार वास्तविकता यह होती है कि समस्याएँ उतनी बड़ी नहीं होतीं जितनी बड़ी उनका अनुभव करा दिया जाता है। इस प्रकार लोगों के सामने समस्याओं का एक बहुत बड़ा पहाड़ खड़ा हुआ प्रतीत होने लगता है, और राज्य लगातार उनके समाधान में लगा हुआ दिखाई देता है।

ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि समाज के बीच जागरूकता बढ़ाई जाए। यदि समाज यह समझ सके कि कई समस्याएँ वास्तविक से अधिक बढ़ाकर प्रस्तुत की जाती हैं, तो लोगों की सजगता और समझ ही उनका वास्तविक समाधान बन सकती है।