धर्म, राजनीति और समाज: भारत के भविष्य की नई दिशा

मैंने कल नई राजनीतिक व्यवस्था की संभावना पर कुछ चर्चाएँ की थीं। इस चर्चा को बढ़ाते हुए मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भारत लगातार दुनिया का मार्गदर्शन करने की दिशा में बढ़ रहा है। पहली बार भारत में एक ऐसी सरकार काम कर रही है, जो तानाशाह नहीं है, बल्कि धर्म से अनुशासित है।

भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में जितना महत्व नरेंद्र मोदी का है, ठीक उतना ही महत्व मोहन भागवत का भी है। ऐसा भारत में पहली बार हुआ है और ऐसा दुनिया में भी पहला प्रयोग है, जहाँ धर्म और राजनीति अपने-अपने सीमाओं में रहकर मिलकर निर्णय कर रहे हैं।

ईरान में धर्म ने राजनीति को दबा दिया था, साम्यवादी देशों में राजनीति ने धर्म को समाप्त कर दिया। लोकतांत्रिक देशों में भी धर्म का महत्व नगण्य ही है, लेकिन भारत अकेला ऐसा है जहाँ धर्म और राजनीति समान के आधार पर कार्य कर रहे हैं, इसलिए दिशा बिल्कुल ठीक है।

लेकिन धर्म और राजनीति का एक होना आदर्श स्थिति नहीं है। आदर्श स्थिति यह होनी चाहिए कि राजनीति स्वतंत्र रहे और धर्म राजनीति को सलाह तक सीमित रहे। यदि धर्म या राजनीति उद्दंड होने लग जाए, तब समाज दोनों को नियंत्रित करे।

इस तरह एक समाज की शक्ति भी बननी चाहिए, जिसका इशारा कल मैंने आपको किया था, और मुझे भारत से यह उम्मीद दिखती है कि जब धर्म और राजनीति एक होने लगेंगे, तब एक तीसरी शक्ति समाज के नाम से खड़ी होगी।

वर्तमान समय में हमारा यह कर्तव्य है कि हम संघ या बीजेपी, दोनों को अपनी इच्छा अनुसार समर्थन करते रहें। सहयोग भी कर सकते हैं, लेकिन अपने समाज का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त न होने दें। अर्थात हम संघ या भाजपा के पीछे न चलें। यदि हमारे अंदर कुछ स्वतंत्र करने की योग्यता है, तो हम अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखकर इन दोनों में से किसी की मदद कर सकते हैं।

संघ, भारतीय जनता पार्टी और तीसरी शक्ति—इन तीनों में से आप अपना विकल्प चुन सकते हैं, लेकिन आप तटस्थ भी रह सकते हैं। इन चारों स्थितियों को छोड़कर पाँचवीं स्थिति समाज के लिए घातक मानी जाएगी।