शिक्षा नहीं, ज्ञान और श्रम: नई नीति की आवश्यकता
दुनिया के साथ-साथ भारत ने भी अपनी विपरीत नीतियाँ बनाईं। जिस दिशा में दुनिया चल रही थी, भारत आँख बंद कर नकल करता रहा। वास्तविकता यह है कि शिक्षा को रोजगार का माध्यम घोषित किया गया, लेकिन उसका देश को नुकसान हुआ। ज्ञान को यदि रोजगार का माध्यम घोषित किया जाता, तो वर्तमान स्थिति की अपेक्षा शिक्षा भी अधिक होती और बेरोजगारी भी शून्य होती, क्योंकि शिक्षा रोजगार का सृजन नहीं करती, बल्कि रोजगार में छीना-झपटी करती है।
श्रमजीवियों का रोजगार छीनकर शिक्षित लोगों को देना रोजगार का सृजन नहीं है। रोजगार का सृजन तो श्रम ही कर सकता है।
वर्तमान युद्ध हमारे लिए एक वरदान लेकर आया है। अब इस युद्ध के माध्यम से कुछ आवागमन महँगा होगा, कुछ खाद महँगी होगी, कुछ डीजल-पेट्रोल महँगा होगा। अब लगभग 10% लकड़ी का प्रयोग बढ़ेगा। अब उम्मीद है कि पशुओं के दिन भी फिरेंगे। अब श्रम की मांग भी बढ़ेगी और गोबर का महत्व भी पता चलेगा।
अब श्रम-शोषण के माध्यम से जो लोग बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे थे, उनकी विकास दर कुछ कम होगी। श्रम, पशु, प्राकृतिक खाद—इन सब का महत्व बढ़ेगा। मैं इस युद्ध से बहुत प्रसन्न हूँ।
मेरा सरकार को सुझाव है कि जो पैसा शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है, वह सारा बजट यदि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना या जी. राम जी योजना पर खर्च कर दिया जाए, तो काया-पलट हो सकता है।
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