कंकाल लेकर बैंक पहुँचना: नियम, मानवीयता और व्यवस्था पर सवाल

आज मैंने मीडिया के हर क्षेत्र में यह समाचार पढ़ा भी और देखा भी कि उड़ीसा में एक आदिवासी अपने मृत बहन का पैसा निकालने बैंक जाता है। बैंक वाले उससे उसकी बहन के मरने का प्रमाण पत्र मांगते हैं। वह व्यक्ति वापस जाकर अपनी बहन की लाश का कंकाल बैंक लेकर जाता है। यह घटना एक विश्वव्यापी समाचार बन जाती है। मीडिया वालों ने इस घटना को एक बहुत बड़े समाचार के रूप में उपयोग किया। मानवाधिकार आयोग भी बीच में कूद पड़ा। अन्य अनेक पेशेवर संस्थाएँ इस घटना का बढ़ा-चढ़ाकर उपयोग करने लगीं।

मैंने भी इस पर गंभीरता से विचार किया। मैं अभी तक नहीं समझ सका कि क्या बैंक अधिकारी गलत था। क्या यह पूरी घटना प्रायोजित तो नहीं थी? सरकार ने भी इस घटना को बहुत महत्वपूर्ण माना और उस व्यक्ति को बैंक राशि के अलावा भी एक बड़ी आर्थिक मदद की। लेकिन यह गंभीर प्रश्न है कि क्या इस घटना को इतना बड़ा बनाया जाना उचित था। क्या हमारी व्यवस्था में कोई गड़बड़ी है? और यदि गड़बड़ी है, तो व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है, तोड़ने की नहीं।

अब भविष्य में बैंक अधिकारियों को क्या करना चाहिए, यह निर्देश कहाँ से मिलेगा, कौन देगा—यह एक गंभीर प्रश्न है। मेरे विचार से इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया का बहुत बड़ा दोष है, जो इस प्रकार की घटनाओं को अतिरंजित बनाकर उसका लाभ उठाना चाहता है। यह बात सामने आनी चाहिए कि यह घटना प्राकृतिक थी या प्रायोजित।

यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि उस व्यक्ति ने अपनी बहन का इतने दिनों तक दाह संस्कार क्यों नहीं किया। जिस तरह की फोटोग्राफी की गई और उसका प्रचार किया गया, उससे कई प्रश्न पैदा होते हैं। यदि यह घटना पूरी तरह सच भी है, तब भी इस घटना में किसी तरह का कोई अत्याचार स्पष्ट रूप से नहीं दिखता।