केरल और बंगाल के चुनाव परिणाम: साम्यवाद के पतन का विश्लेषण

आज दिन भर हम चुनाव परिणाम पर चर्चा करेंगे। केरल के चुनाव परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत में साम्यवाद का पूरी तरह सफाया हो गया है। बंगाल में तो 15 वर्ष पूर्व ममता बनर्जी ने साम्यवाद का सफाया कर दिया था और अब आख़िरी बचे केरल से भी साम्यवाद खत्म हो गया है। अब भारत में साम्यवाद का कोई संगठनात्मक ढांचा नहीं बचा। यह ज़रूर है कि वैचारिक धरातल पर अभी साम्यवाद है और उसका गढ़ जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी है, लेकिन अब साम्यवाद के पत्ते और तने सब समाप्त हो गए हैं, सिर्फ जड़ बची है, उसे खोदकर निकालना बाकी है। नक्सलवाद तो 2 महीने पहले ही खत्म हो गया था, अब केरल से साम्यवाद का पतन हो गया और अगले दो-चार वर्षों में जेएनयू की भी सफाई हो जाएगी और तब हम भारत को साम्यवाद मुक्त भारत घोषित कर सकेंगे। फिर भी केरल में साम्यवाद का जैसा पतन हुआ है, वह भारत की जनता के लिए स्वागत योग्य है, क्योंकि सारी दुनिया में वैचारिक धरातल पर साम्यवाद ही सबसे अधिक जहरीला विचार माना जाता है और अब उस साम्यवाद के समापन की एक महत्वपूर्ण कड़ी केरल से पूरी हो गई है। हमें केरल के परिणाम का स्वागत करना चाहिए।

आज की चुनावी चर्चा में हम लोगों ने प्रातःकाल साम्यवाद के पतन पर चर्चा की थी। अब हम चर्चा करते हैं इस्लाम पर। बंगाल का आख़िरी गढ़ ढह गया और भारत के मुसलमानों की ममता बनर्जी के पतन के बाद अंतिम उम्मीद भी समाप्त हो गई है। संभल के एक मुस्लिम धर्मगुरु ने चार दिन पहले ही बंगाल के मुसलमानों को बताया था कि हम यूपी में अब शेर के सामने लोमड़ी के समान संभलकर चलते हैं, इसी तरह मुसलमानों का बंगाल में भी हाल होगा। अब वह बात सच साबित हुई है कि मुसलमानों को भी पूरे समाज के सामने अकड़कर चलने का समय गया। बंगाल के चुनाव में जीत किसकी हुई और हार किसकी हुई, इसकी यदि तह तक तलाश की जाए, तो बंगाल के चुनाव में जीत संघ की हुई है। संघ परिवार की मेहनत, योजना और नीतियों ने यह सफलता दिलाई है। चुनाव आयोग, ईडी, न्यायपालिका, राज्यपाल, सेना ने तो सिर्फ भयमुक्त वातावरण बनाने में मदद की है। उत्तर प्रदेश के पुलिस वाले के समक्ष एक मुसलमान नेता की अकड़ ने भी भाजपा की जीत में मदद की है। बंगाल में ममता के हारने का प्रमुख कारण रही ममता की गुंडागर्दी। बंगाल में साम्यवादी तानाशाही को ममता ने सफलतापूर्वक चुनौती दी थी, लेकिन ममता का कार्यकाल भी साम्यवादियों के समान ही भय का कार्यकाल रहा। बंगाल में यदि पुलिस सेवा, चुनाव आयोग भयमुक्ति का भरोसा नहीं देते, तो ममता सरकार की गुंडागर्दी से बंगाल को बचना असंभव था। इसलिए मैं यह कह सकता हूं कि बंगाल चुनाव में ममता की दादागिरी और संघ की मेहनत बहुत काम आई। अब यह बात साफ हो गई है कि मुस्लिम सांप्रदायिकता का अंतिम किला भी ध्वस्त हो गया है और अब देश को सांप्रदायिकता से मुक्त घोषित करने का समय बहुत नज़दीक आ रहा है। साम्यवादी तानाशाही और मुस्लिम सांप्रदायिकता से मुक्ति भारत के लिए बहुत शुभ लक्षण है।