बंगाल चुनाव के बाद मुस्लिम समाज के भीतर चल रहा वैचारिक संघर्ष

बंगाल का चुनाव होने के बाद मुसलमान इस बात पर गंभीरता से सोच रहा है कि उसे क्या करना चाहिए। जब वह अपने बच्चों को देखता है, तब उसे ऐसा लगता है कि मुझे भारत में ही रहना है, मिल-जुलकर रहना है। मुझे बराबरी के आधार पर रहने में क्या कठिनाई है? मैं भारत से अपने परिवार को या संपत्ति लेकर कहीं जाने की स्थिति में नहीं हूं, इसलिए मुझे अपनी संकीर्ण सोच में बदलाव लाना चाहिए।

दूसरी तरफ, जब उसे कट्टरवादी मुसलमान जाकर समझाते हैं कि तुम्हें खुदा पर भरोसा रखना चाहिए, खुदा तुम्हें हारने नहीं देगा। दुनिया में मुसलमान की ताकत बहुत बड़ी है और दुनिया का मुसलमान कभी भी पीछे नहीं हटा। हम जिस भारत पर सैकड़ों वर्षों तक राज कर चुके हैं, उस भारत में अब इस तरह की कायरता की सोच उचित नहीं है। हम मुसलमान हैं, हम शेर हैं, हम मरना-मारना जानते हैं। हमें गायों से डरने की क्या जरूरत है? तब उसके अंदर एक जोश पैदा हो जाता है और जोश में आकर वह पत्थर चलाना शुरू कर देता है।

जब जेल जाता है, तब कसम खाता है कि कभी पत्थर नहीं चलाऊंगा और जब कट्टरपंथी मिल जाते हैं, फिर वह पत्थर चलाने में शामिल हो जाता है। यह बात सच है कि कुछ कट्टरपंथी मुसलमान ही भारत के मुसलमान के लिए समस्या बने हुए हैं, लेकिन मुसलमान कट्टरपंथी मुसलमान से मुक्त नहीं हो पा रहा है और न वह अपने बाल-बच्चों का भविष्य सोच पा रहा है।

फिर भी धीरे-धीरे शांतिप्रिय मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है। शिक्षा के क्षेत्र में या अन्य मामलों में वे धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं, भले ही उनकी अभी गति बहुत कम है। बंगाल चुनाव के बाद अब ऐसा लगता है कि मुस्लिम सांप्रदायिकता की हिम्मत टूट रही है।

मैं अपने कट्टरपंथी हिंदू भाइयों से भी निवेदन करूंगा कि वे सरकार पर भरोसा करें, अपनी एकता मजबूत करें, साथ ही शांतिप्रिय मुसलमानों को शांति से सोचने का अवसर दें। बार-बार उन्हें ललकारना अच्छी बात नहीं है।