यूजीसी और जातीय आरक्षण पर बहस का समापन: संतुलित दृष्टिकोण
हम पिछले कई दिनों से यूजीसी और जातीय आरक्षण पर चर्चा करते रहे हैं। आज हम इस चर्चा को समाप्त करेंगे। हम सभी किसी भी प्रकार के जातीय आरक्षण के विरुद्ध रहे हैं, और यूजीसी के मामले में भी हमारा यह मानना रहा है कि सरकार से कहीं न कहीं कुछ त्रुटि हुई है। फिर भी, जिस प्रकार इस मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष बने हैं, हम उससे सहमत नहीं हैं। सरकार के पक्ष में संघ या अन्य भाजपा से जुड़े लोग इस विषय पर अधिक चर्चा करना उचित नहीं समझते, क्योंकि उनके अनुसार इस चर्चा को अनावश्यक रूप से बढ़ाना ठीक नहीं है। वहीं विपक्ष के लोग इस मुद्दे को आगे बढ़ाकर इसका अधिकतम राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। इनमें भी तीन प्रकार के लोग दिखाई देते हैं— हम न तो सरकारी पक्ष से पूरी तरह सहमत हैं और न ही विरोध पक्ष से। हमारा सुझाव है कि आरक्षण समाप्त होना चाहिए, लेकिन इस विषय पर गंभीरता से विचार-विमर्श कर सरकार के सामने एक ठोस प्रस्ताव रखा जाना चाहिए। हमारी समिति इस प्रकार का प्रस्ताव तैयार कर रही है, जिसे हम सरकार के समक्ष प्रस्तुत कर सकें। हम आरक्षण समाप्त करने के पक्षधर हैं, लेकिन उस तरीके से नहीं, जिस प्रकार कुछ स्वर्ण वर्ग चाहते हैं। हम एक नए दृष्टिकोण के साथ आरक्षण समाप्त करने की बात कर रहे हैं। हम प्रयास करेंगे कि एक-दो दिनों में राष्ट्रीय स्तर की एक समिति बनाकर आरक्षण समाप्त करने का प्रस्ताव समाज के सामने प्रस्तुत किया जा सके।
पहले, वे निष्ठावान ब्राह्मण, जो यूजीसी में सरकार की गलती की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।
दूसरे, वे सावरकरवादी, जो यूजीसी के मुद्दे के माध्यम से सरकार को मुसलमानों के विरुद्ध घेरना चाहते हैं।
तीसरे, वे कांग्रेसी, जो यूजीसी के नाम पर नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत पर आक्रमण करना चाहते हैं।
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