बंगाल उपचुनाव के नतीजे और बदलता राजनीतिक समीकरण
25 में प्रातःकालीन सत्र
बंगाल में 15 दिन पहले चुनाव का नतीजा आ चुका था। एक सीट पर चुनाव दोबारा कराया गया और यह बात साफ दिख रही थी कि इस फलता उपचुनाव में Bharatiya Janata Party साधारण बहुमत से जीत जाएगी, क्योंकि Mamata Banerjee का भी मनोबल गिरा हुआ था और उम्मीदवार का भी मनोबल कमजोर था। फिर भी चुनाव का नतीजा अप्रत्याशित रहा है।
इस नतीजे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। फलता में हुए मतदान में लगभग 1 लाख 20 हजार हिंदुओं ने मतदान किया और 80 हजार मुसलमानों ने मतदान किया। कुल मतदान 2 लाख 90 हजार के आसपास हुआ।
प्रश्न उठता है कि जब 1 लाख 20 हजार हिंदुओं ने मतदान किया, तो 1 लाख 50 हजार वोट बीजेपी को कहां से मिले? यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि जब वहां 80 हजार मुसलमानों ने वोट दिया, तो Communist Party of India (Marxist) को 40 हजार वोट मिले और अन्य को 10 हजार। बात बिल्कुल साफ है कि आधे से अधिक मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिया।
प्रश्न यह खड़ा होता है कि वहां All India Trinamool Congress का कितना प्रभाव था कि टीएमसी उम्मीदवार 10 हजार वोट भी नहीं पा सका। मैं मानता हूं कि दो दिन पहले जहांगीर खान ने अपने को अलग कर लिया था, लेकिन ममता बनर्जी ने इस चुनाव से अपने को अलग नहीं किया था।
इस चुनाव के नतीजे ने यह बात साफ कर दी है कि बंगाल का मुसलमान या तो डर से अपने विचार बदलने की कोशिश कर रहा है अथवा उम्मीदवार जहांगीर खान ने भय के कारण सरकार का समर्थन कर दिया है। कोई तीसरा कारण दिखाई नहीं देता।
वर्तमान बंगाल का जो वातावरण है, उस वातावरण में अगर चुनाव हो जाए, तो एक भी सीट टीएमसी नहीं जीत पाएगी, क्योंकि बंगाल में अब डर ममता का नहीं है, टीएमसी का नहीं है। या तो डर नहीं है, या यदि डर है तो सरकार का है।
ऐसे वातावरण में ममता बनर्जी के लिए यह उचित है कि वह कांग्रेस में शामिल होकर अपनी सुरक्षा की चिंता करें और प्रधानमंत्री बनने का सपना छोड़ दें। यदि ममता बनर्जी Rahul Gandhi की अधीनता स्वीकार कर लें, तो ममता बंगाल में राजनीतिक आधार पर जिंदा रह सकती हैं।
बंगाल का मुसलमान गुजरात और उत्तर प्रदेश की राह पर चलने की सोच रहा है। ममता नितांत अकेली खड़ी हैं। कम्युनिस्ट पार्टी को 40 हजार वोट और टीएमसी को 10 हजार वोट — यह बहुत गंभीरता से सोचने का समय है।
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